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स्वामी श्रद्धानन्द कौन थे? जानें, Swami Shraddhanand का हत्यारा कौन था

स्वामी ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और 1920 के दशक में हिंदू समाज और भारत को संगठित करने और शुद्धि आंदोलन चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 1922 में कहा था कि श्रद्धानन्द अछूतों के सबसे बड़े और सच्चे हितैषी थे। अगर आप नहीं जानते की, स्वामी श्रद्धानन्द कौन थे और Swami Shraddhanand का हत्यारा कौन था? तो हम इसके बारे में बताने जा रहे है।

स्वामी श्रद्धानन्द कौन थे और Swami Shraddhanand का हत्यारा कौन था

स्वामी श्रद्धानन्द कौन थे

स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती एक भारतीय शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी और आर्य समाज के संन्यासी थे जिन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया। वह भारत के महान देशभक्त संन्यासियों में से एक थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वतंत्रता, स्वशासन, शिक्षा और वैदिक धर्म के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम विज) का जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब प्रांत के जालंधर जिले के तलवान गांव में एक खत्री परिवार में हुआ था।

उनके पिता श्री नानकचंद विज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा शासित संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में एक पुलिस अधिकारी थे। उनके बचपन के नाम बृहस्पति विज और मुंशीराम विज थे, लेकिन मुंशी राम उनकी सादगी के कारण अधिक लोकप्रिय हो गए। पिता के अलग-अलग जगहों पर स्थानांतरण के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा अच्छी नहीं चल सकी। लाहौर और जालंधर उनके काम के मुख्य स्थान थे। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए बरेली पहुंचे।

पुलिस अधिकारी नानकचंद विज अपने पुत्र मुंशी राम विज के साथ स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रवचन सुनने पहुंचे। युवावस्था तक मुंशी राम विज ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानंद जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशी राम विज को ईश्वर में दृढ़ विश्वास और वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

Swami Shraddhanand का जीवन परिचय

Swami Shraddhanand एक सफल वकील बने और बहुत नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। वकालत के साथ उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत आर्य समाज जालंधर के जिलाध्यक्ष के पद से हुई। वे आर्य समाज में बहुत सक्रिय थे। उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी से हुआ था। जब आप 35 वर्ष के थे तब शिव देवी स्वर्ग सिद्धरी। उस समय उनके दो बेटे और दो बेटियां थीं। इन्द्र विद्यावाचस्पति उनके इकलौते पुत्र थे। सन् 1917 में उन्होंने सन्यास ले लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए।

1901 में, मुंशी राम विज ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा प्रणाली के स्थान पर वैदिक धर्म और भारतीयता सिखाने वाली संस्था गुरुकुल की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल स्कूल खोला गया। वर्तमान में यह एक मानद विश्वविद्यालय है जिसका नाम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय है।

उन्होंने पत्रकारिता में भी कदम रखा। वे धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उर्दू और हिंदी भाषाओं में लिखते थे। बाद में, स्वामी दयानंद सरस्वती का अनुसरण करते हुए, उन्होंने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को प्राथमिकता दी। उनका पत्र सधर्म प्रचारक पहले उर्दू में प्रकाशित हुआ और बहुत लोकप्रिय हुआ, लेकिन बाद में उन्होंने इसे उर्दू के बजाय देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी में निकालना शुरू किया। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान भी हुआ।

जब स्वामी श्रद्धानन्द ने कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को “मुस्लिम तुष्टीकरण की घातक नीति” अपनाते हुए देखा, तो उन्हें लगा कि यह नीति लंबे समय में राष्ट्र के लिए विघटनकारी साबित होगी। इसके बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया।

स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा

हिंदू समाज को ईसाई धर्म और इस्लाम के जबरन धर्मांतरण से बचाने के लिए, उनके द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए आर्य समाज ने ईसाई और इस्लाम के धर्मांतरितों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए शुद्धि आंदोलन शुरू किया। इससे 1920 के दशक के दौरान सामाजिक जीवन का सांप्रदायिकरण बढ़ा। 23 दिसंबर 1926 को नया बाजार स्थित उनके आवास पर अब्दुल रशीद नाम का एक कट्टरपंथी हत्यारा धार्मिक चर्चा के बहाने स्वामी श्रद्धानंद के कमरे में घुसा और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

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