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सोरठा की परिभाषा

हम सभी ने अपने बचपन में कई छन्द पढ़े होंगे। अगर हम सबसे ज्यादा याद करते हैं, तो वह दोहा है, या शायद पहला दोहा छंदों के नाम से दिमाग में आता है। यदि आप दोहों को उल्टा कर देंगे, तो सोरठा (Sortha) बन जाएगा। इस लेख में हम सोरठा की परिभाषा क्या है जानेंगे।

सोरठा की परिभाषा

सोरठा की परिभाषा

सोरठा छंद अर्धसममात्रिक छंद हैं, सोरठा छंद के प्रथम और तृतीय चरणों में 11-11 मात्राएं होती हैं, और दूसरे और चौथे चरणों में 13-13 मत्राएं होती हैं। सोरठा छंद, दोहा छंद का बिलकुल उल्टा होता है, इसके प्रथम और तृतीय चरण के अंत में एक गुरु और एक लघु होता है। दूसरे- चौथे चरण के अंत में लघु गुरु होते‌ हैं, तीन लघु भी हो सकते हैं, किंतु गुरु-लघु नहीं हो सकते है, यदि अंत सोरठा यानि 212 से हो तो अति उत्तम सृजन हो जाता है।

सोरठा के उदाहरण

उदाहरण 1 – जो सुमिरत सिधि होई, गननायक करिवर बदन।
करहु अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ-गुन सदन॥

जानि गौरि अनुकूल, सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे॥

उदाहरण 2 – दे सुख-यश-उत्कर्ष।
काल-ग्रन्थ का पृष्ठ नव॥
अंकित करे सहर्ष।
करनी के हस्ताक्षर॥

उदाहरण 3 – चलते लोग कुचाल , दुर्जन जाकर देखिए।
होते सब बेहाल, काटते बनकर विषधर॥

कंगन का यह राज‌, पनघट छनछन क्यों बजे।
बहुत हुई आबाज, वहाँ लिपटकर डोर से॥

गोरी‌ दर्पण देख, मोहित खुद पर हो रही।
रही रूप को लेख, कनक समझती निज तन॥

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