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सिद्धों की संख्या कितनी थी

सिद्ध साहित्य ब्रजयानी सिद्धों द्वारा रचित साहित्य है। इनका संबंध बौद्ध धर्म से है। वे भारत के पूर्वी भाग में सक्रिय थे। उन्होंने अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी और अपभ्रंश में रचनाओं की रचना की है। सरहप्पा प्रथम सिद्ध कवि थे। राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें हिन्दी का प्रथम कवि माना है। साधना के मंच से निकले सिद्धों के स्वर को ‘चारिया गीत’ कहते हैं। इस लेख में हम सिद्धों की संख्या कितनी थी जानेंगे।

सिद्धों की संख्या कितनी थी

सिद्धों की संख्या कितनी थी

सिद्धों की संख्या 84 मानी जाती है, जिनमें सरहप्पा, शबरप्पा, लुइप्पा, डोम्भिप्पा, कुक्कुरिप्पा आदि मुख्य हैं। सिद्ध साहित्य में जातिवाद और अलौकिक पर प्रहार किया गया है। इसमें देवता की स्तुति और सहज साधना पर बल दिया गया है। इसमें महासुखवाद के द्वारा ईश्वरत्व प्राप्ति पर बल दिया गया है। लुइपा सिद्ध साहित्य के लेखकों में सर्वश्रेष्ठ हैं।

सिद्धों का चरम काल आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच था। उनके मुख्य केंद्र श्रीपर्वत, अर्बुदापर्वत, तक्षशिला, नालंदा, असम और बिहार थे। सिद्धों को पाल वंश का संरक्षण प्राप्त था। बाद में, आक्रमणकारियों से त्रस्त और दुखी मुसलमान आदर्श ‘भोर’ देश यानी नेपाल, भूटान, तिब्बत की ओर चले गए।

सिद्धों के बारे में सबसे पहली जानकारी ज्योतिरीश्वर ठाकुर की रचना ‘वर्णरत्नकर’ से मिलती है। सिद्धों की रचनाओं की खोज सबसे पहले नेपाल के हरप्रसाद शास्त्री ने की थी। वर्ष 1917 में बंगाली भाषा में ‘बौद्ध गान और दोहा’ के नाम से उनके छंदों का संकलन किया गया। इसके बाद राहुल सांकृत्यायन ने सबसे पहले 1045 में प्रकाशित ‘हिंदी काव्यधारा’ में सिद्धों के बारे में विस्तृत और आलोचनात्मक जानकारी दी।

राहुल ने सिद्ध साहित्य की शुरुआत सरहपा से मानी है और उनका (सरहपा का) समय लगभग 769 ईस्वी माना जाता है। उन्होंने सिद्धों की संख्या चौरासी मानी है जिसमें 80 पुरुष और 4 महिलाएँ (कनखलापा, लक्ष्मीकारा, मणिभद्र, मेखलापा) थीं। मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छचंदरनाथ), जालंधरनाथ, नागार्जुन, चरपटनाथ और गोरखनाथ – ये सिद्ध कवि हैं जो नाथ साहित्य में भी दिखाई देते हैं।

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