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शब्बे बारात क्या है

शब्बे बारात या शब-ए-बारात (Shab-e-Barat) के अगले दिन मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखते हैं। यह उपवास अनिवार्य नहीं है लेकिन इसे नफिल रोजा कहा जाता है। यानी रमजान के रोजे की तरह यह रोजा जरूरी नहीं है, अगर कोई इस रोजा रखता है तो उसे उसका पुण्य मिलता है, लेकिन अगर नहीं रखा जाता है तो यह पाप नहीं है। इस लेख में हम, शब्बे बारात क्या है जानेंगे।

शब्बे बारात क्या है

शब्बे बारात क्या है

शब्बे बारात या शब-ए-बारात (Shab-e-Barat) दो शब्दों शब और बारात से मिलकर बना है, जहां शब का मतलब रात और बारात का मतलब बरी होना है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है। मुसलमानों के लिए यह रात बड़े ही शान की रात मानी जाती है, इस दिन दुनिया के तमाम मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं। वे प्रार्थना करते हैं और अपने पापों का पश्चाताप करते हैं।

शब-ए-बरात इस्लामी दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। मुस्लिम समुदाय के लोग रात भर जागकर प्रार्थना करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। शब-ए-बारात को मुस्लिम समुदाय के लिए नमाज़, फ़ज़ीलत, रहमत और मगफिरत की रात माना जाता है। यानी इस रात को लोग इबादत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं।

शब-ए-बरात का अर्थ इस प्रकार है। शब का अर्थ है रात और बारात का अर्थ है बरी होना। शब-ए-बरात के दिन दुनिया को छोड़कर चले गए लोगों की कब्रों पर चाहने वाले लोग दुआ मांगते है और रोशनी जलाते है। इस दिन सच्चे दिल से अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगने से जन्नत में जगह मिलती है।

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