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संत चोखामेला (चोखोबा) इतिहास की जानकारी (माहिती)

संत चोखामेळा (चोखोबा) एक प्रापंचिक गृहस्थ थे, जो मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते थे। वह महाराष्ट्र के कुलदेवता कहे जाने वाले श्री विठ्ठल के बड़े भक्त थे, जिनका नामस्मरण हमेशा उनके मुखसे होता रहता था। गरीबी के वातावरण में भी रहते हुए उनके मन में विठ्ठल के प्रति बड़ी श्रद्धधा और भक्ति थी। इतने बड़े भक्त होने के बावजूद भी वह अपने विठ्ठल के दर्शन नहीं ले सकते थे, जिसका कारण उन्हे जातिवाद के कारण से मंदिर में प्रवेश वर्जित था। इस लेख में हम, संत चोखामेला (चोखोबा) इतिहास की जानकारी (माहिती) इसे संक्षेप में जानेंगे।

संत चोखामेला (चोखोबा) इतिहास की जानकारी (माहिती)

संत चोखामेला का जन्म कब और कहा हुआ

संत चोखामेला का कब जन्म हुआ यह अज्ञात है, लेकिन अनौपचारिक रूप से उनके जन्म का वर्ष 1270 बताया जाता है। चोखामेला का महाराष्ट्र के मेहुणपुरी, तालुका देऊलगाव, जिला बुलढाणा में जन्म हुआ। वो महार जातिसे आते थे। उनके परिवार के सदस्य में उनकी बीवी सोयरा, बहन निर्मला, साला बंका और उनका बेटा कर्ममेला शामिल थे। पूरा परिवार श्री विठ्ठल का भक्त था जिनकी पूजा हररोज उनके घर में होती थी।

संत चोखामेला इतिहास की जानकारी (माहिती)

विठ्ठल की भक्ति की छह में वह पंढरपुर चले गए। उस वक्त की परिस्थिति अनुसार ऊंची जातियों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया, और न ही उन्हें मंदिर के दरवाजे पर खड़ा होने दिया, इसलिए उन्होंने चंद्रभागा नदी के दूसरी तरफ एक झोपड़ी बनाई और अपने भगवान की वहा से भक्ति करनी शुरू कर दी। 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानदेव के कारण चंद्रभागा नदी में आध्यात्मिक लोकतंत्र का उदय हुआ।

तो संत चोखोबा अपने अभंग में कहते हैं, ‘खटनट यावे, शुद्ध होऊनी जावे। दवंडी पिटीभावे डोळा।।’… बताते हुए, उन्होंने अपने उपेक्षित भाइयों को वारकरी संप्रदाय के आध्यात्मिक, एकजुट भक्ति का नमक बताया। ज्ञानेश्वर के सभी संतों का ईमानदारी से मानना ​​था कि उस समय समाज के सबसे निचले स्तर के लोगों को आत्म-विकास का अवसर दिया जाना चाहिए। वहीं संत चोखोबा ने अपने अभंगों के माध्यम से समाज के सदस्यों को भक्ति मार्ग का संदेश दिया।

जब कोई सुसंस्कृत, संवेदनशील संत चोखोबा के भाईचारे का अनुभव करने की कोशिश करता है, तो वह एक मौन रोने का अनुभव करता है। संत चोखोबा संत ज्ञानेश्वर के प्रभाव में संतों में से एक थे। संत नामदेव उनके गुरु थे। उस समय की सामाजिक असमानता के कारण चोखोबा भाग गए। वह शूद्र-अतिशूद्र, सामाजिक जीवन, भौतिक मामलों, श्रेष्ठता और जाति व्यवस्था में उलझ गया।

संत चोखामेला का मृत्यु कब और कहा हुआ

संत चोखामेला का मृत्यु सन 1338 में और कहा हुआ पंढरपुर के पास मंगलवेदा गाव में मजदूरी करते दीवार गिरने के हादसे में हुआ। कहा जाता है की, पंढरपुर के पास मंगलवेदा में दीवार का निर्माण करते समय दीवार गिरने से कुछ मजदूरों समेत चोखामेला की भी उनमें मृत्यु हुई, जिनके मृत शरीर की शिनाख्त उनके हड्डियों से किया गया जिनसे विट्ठल का नाम सुना जा सकता था। ऐसे नामदेव ने चोखोबा की अस्थियों की पहचान कर उन्हें एकत्र किया। चरित्रकार का कहना है कि पंढरपुर में विट्ठल मंदिर के सामने उनकी समाधि बनाई गई थी।

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