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सम्प्रेषण की प्रक्रिया क्या है

सम्प्रेषण प्रक्रिया में प्रेषक अनेक संकेतों द्वारा अपने हाव – भावों द्वारा, अपनी भाषा द्वारा संदेश को प्राप्तकर्ता तक पहुँचाने का प्रयास करता है। प्राप्तकर्ता लिखित संकेतों को पढ़ता है तथा मौखिक संकेतों को सुनता है उन्हें समझने एवं उन पर अमल करने का प्रयास भी करता है। संदेश भेजने का माध्यम कुछ भी हो सकता है। यह पत्र द्वारा, व्यक्ति द्वारा, ई – मेल द्वारा या फोन द्वारा भी भेजा जा सकता है। संदेश का प्राप्तकर्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है यह फीड बैक के माध्यम से ज्ञात होता है। इस लेख में हम सम्प्रेषण की प्रक्रिया क्या है जानेंगे।

सम्प्रेषण की प्रक्रिया क्या है

सम्प्रेषण की प्रक्रिया क्या है

संचार वास्तव में सूचना सम्प्रेषण की एक प्रक्रिया है जिसमें सम्प्रेषक संदेश को किसी संचार माध्यम एवं संचार मार्ग द्वारा श्रोता या ग्राहक तक पहुँचाता है और श्रोता की प्रतिपुष्टि या फीड बैक भी इसमें महत्त्वपूर्ण होती है। प्रत्येक प्रकार के सम्प्रेषण के लिए सम्प्रेषक तथा श्रोता में परस्पर समता का होना भी आवश्यक है। विषम स्थिति में यह सम्प्रेषण अवरुद्ध हो जाता है। यह समता का तत्व सम्प्रेषक एवं श्रोता के मध्य संदेश की भाषा , संकेत एवं सूचना तत्व के स्तर पर होना चाहिए।

सम्प्रेषण के मूल तत्व – सम्प्रेषण के पाँच मूल तत्व होते हैं:

1. प्रेषक (Communicatior)
2. माध्यम (Channel)
3. संदेश (Message)
4. प्राप्तकर्ता (Receiver)
5. प्रतिपुष्टि (Feedback)

(1) प्रेषक – सम्प्रेषण प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण है संदेश का स्त्रोत अर्थात् प्रेषक , जो सम्प्रेषण – प्रक्रिया को आरम्भ करता है। कोई भी सम्प्रेषण घटित नहीं हो पाएगा जब तक उसका कोई प्रेषक नहीं होगा यह सम्प्रेषण प्रक्रिया का स्त्रोत एवं सूत्रधार होता है। प्रेषक में कुछ गुणों का होना आवश्यक है ताकि सम्प्रेषण प्रभावशाली ढंग से हो सके।

(i) प्रेषक को स्पष्ट एवं सटीक संदेश लिखने तथा विचारों को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्दावली की जरूरत है क्योंकि भाषायी कौशल किसी सम्प्रेषण प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है । यदि प्रेषक में भाषायी ज्ञान और अभिव्यक्ति करने की क्षमता का अभाव होता है तो उसका सम्प्रेषण ही प्रभावहीन हो जाता है । अतः उसे लिखना , बोलना , पढ़ना , सुनना , तर्क वितर्क करना , रंग चित्र आदि बनाना तथा किसी प्रकार से संकत देना आदि सभी का ध्यान रखना चाहिए ।

(ii) संचारक का अपने प्रति रवैया (जैसे- प्रथम बार सार्वजनिक भाषण में डर से पैरों का काँपना) विषय वस्तु के प्रति उसकी धारणा (जैसे – एक बहुत ही सफल विक्रेता सही ढंग से माल नहीं बेच सकता यदि वह स्वयं उसमें विश्वास नहीं करता), प्राप्तकर्ता के प्रति उसका आचार – व्यवहार (जैसे- बोलने वाले में वे सभी गुण हों जो सुनने वाले को आकर्षित करें) आदि सभी का ध्यान रखना चाहिए।

(iii) प्रेषक के ज्ञान का प्रभाव उसके सम्प्रेषण पर भी पड़ता है। विषयवस्तु की सही समझ , सही मनोवृत्ति , उचित माध्यम का चुनाव , प्राप्तकर्ता की सोच तथा आवश्यकता की जानकारी सम्प्रेषण को प्रभावी बनाती है।

(2) माध्यम– माध्यम प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता के बीच एक सेतु है। माध्यम कुछ भी हो सकता है जिसे प्रेषक स्वयं को प्राप्तकर्ता से जोड़ने के लिए प्रयोग करता है जैसे- पारस्परिक बातचीत, व्यक्तिगत पत्राचार, कोई सभा या मीटिंग, टेलिफोन, टेलीविजन, रेडियो , समाचार पत्र आदि। ये सब माध्यम प्रेषक को अपने संदेश प्राप्तकर्ता तक पहुँचाने में मदद करते हैं। माध्यम का चुनाव सही होना चाहिए इसी पर सम्प्रेषण की सफलता निर्भर करती है।

(3) संदेश – प्रेषक जब बोलकर, लिखकर, चित्र बनाकर या संकेतों के माध्यम से अपने विचारों को प्रस्तुत करता है तब वह संदेश कहलाता है। किसी प्रकार की अपील भी संदेश हो सकती है । प्रेषक को संदेश भेजने से पूर्व यह ध्यान रखना चाहिए कि संदेश की विषय – वस्तु क्या है ? उसका विवेचन किस प्रकार करना है? उसका किस माध्यम से प्रसारण करना है तथा किन लोगों के लिए संदेश देना है?

यदि इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया तो सम्प्रेषण विफल हो जाता है। जैसे ग्रामीण लोगों के साथ या अनपढ़ लोगों के साथ उन्हीं के स्तर ही नहीं पाएगी।

(i) संदेश का प्रसारण इस प्रकार होना चाहिए कि वह प्राप्तकर्ता का ध्यान आकर्षित कर सके। इसके लिए आवश्यक है कि संदेश सरल, स्पष्ट, आकर्षक एवं लोगों के सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण के अनुकूल हों।

(ii) संदेश के प्रस्तुतिकरण में सदैव क्रमबद्धता होनी चाहिए।

(iii संदेश में उन्हीं चिह्नों व संकेतों को सम्मिलित करना चाहिए जो संदेश प्रेषक तथा संदेश प्राप्तकर्ता दोनों के लिए समान अर्थ रखते हों तथा प्राप्तकर्ता उन संकेतों को अच्छी तरह से समझता हो ।

(4) संदेश प्राप्तकर्ता – प्रेषक का संदेश पाने वाला संदेश प्राप्तकर्ता कहलाता है। सम्प्रेषण श्रृंखला के एक छोर पर प्रेषक होता है और दूसरे छोर पर प्राप्तकर्ता प्राप्तकर्ता एक व्यक्ति भी हो सकता है या एक जन समुदाय भी। प्राप्तकर्ता जितना ही प्रेषक के अनुरूप होगा उतना ही प्रभावी सम्प्रेषण होता है। सम्प्रेषण प्रक्रिया तभी पूर्ण होती है जब प्रेषक द्वारा प्रेषित संदेश प्राप्तकर्ता द्वारा प्राप्त कर लिया जाता है।

(5) प्रतिपुष्टि या फीडबैक – इससे तात्पर्य संदेश प्रेषक द्वारा प्रेषित किए गए संदेश या सूचना का संदेश प्राप्तकर्ता पर पड़ने वाले प्रभाव से है। जब प्राप्तकर्ता संदेश प्राप्त करके उस पर अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करता है तो उसे फीडबैक कहते हैं। सम्प्रेषण प्रक्रिया में फीडबैक का बहुत महत्त्व होता है। फीडबैक से ज्ञात होता है कि प्राप्तकर्ता के पास संदेश किस रूप में पहुँचा। प्रेषक अपने संदेश के द्वारा जो कुछ कहना चाहता था, वही प्राप्तकर्ता तक पहुँचा या नहीं। फीडबैक सम्प्रेषण व्यवस्था की स्थिरता तथा संतुलन को बनाए रखता है। संदेश प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया अनुकूल भी हो सकती है और प्रतिकूल भी।

सम्प्रेषण की प्रक्रिया में प्राय : इन पाँच तत्वों का सहारा लिया जाता है परन्तु आज सम्प्रेषण केवल लोगों के बीच या समाचार – पत्र , पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं रह गया है । रेडियो , दूरदर्शन , इन्टरनेट आदि के कारण इसने अत्यन्त विस्तृत रूप ले लिया है । इन माध्यमों के कारण सम्प्रेषण – प्रक्रिया में कुछ और तत्व भी जुड़ गए हैं ।

रेडियो, दूरदर्शन आदि में पहले शब्दों और चित्रों का संकेतीकरण (Encoding) होता है। अर्थात् उन्हें ध्वनि तथा चित्र तरंगों में परिवर्तित किया जाता है। बाद में इनका संकेतवाचन (Decoding) होता है अर्थात् इन तरंगों को पुनः शब्दों एवं चित्रों में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रकार इन माध्यमों के आधार पर सम्प्रेषण – प्रक्रिया के निम्नलिखित सात तत्व माने जाते हैं। संचार की प्रक्रिया क्या है यह उपरोक्त स्पष्टीकरणों और उदाहरणों से ज्ञात होता है।

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