मेन्यू बंद करे

शिरडी साईं बाबा कौन थे? जानिए साई बाबा का इतिहास

साई बाबा, जिन्हें शिरडी साईं बाबा (Sai Baba of Shirdi) के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जिन्हें एक संत माना जाता है, जो अपने जीवनकाल के दौरान और बाद में हिंदू और मुस्लिम दोनों भक्तों द्वारा पूजनीय हैं। इस आर्टिकल में हम, शिरडी साईबाबा कौन थे और साई बाबा का इतिहास क्या है, जिस कारण करोड़ों लोग उन्हे पूजते हैं, यह सब बताने की कोशिश करेंगे।

शिरडी साईं बाबा हिंदू है या मुसलमान? जानिए जन्म से लेकर मृत्यु तक साई बाबा का इतिहास

शिरडी साईं बाबा का जन्म

शिरडी साईं बाबा का जन्म और उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाबा द्वारा अपने पूर्व निजी जीवन के संबंध में भक्तों को कोई ठोस विवरण नहीं दिया गया था। माना जाता है कि उनका जन्म वर्ष 1856 को हुआ था। हालांकि, इतिहासकारों में उनके जन्म वर्ष को लेकर विवाद है।

Sai Baba of Shirdi

साई बाबा का इतिहास

साईंबाबा सन 1872 में किसी बारात के साथ महाराष्ट्र के शिरडी आए। उस समय वे सोलह वर्ष के रहे होंगे। यह बारात गांव के बाहर खंडोबा मंदिर के पास रुकि थी। शिरडी से ‘म्हालसापति’ नाम के एक व्यक्ति प्रतिदिन खंडोबा के दर्शन के लिए मंदिर आते थे। एक दिन उन्होंने इस युवा लड़के को देखा और तुरंत उसे प्यार से ‘आवो साई’ कहा और तब से उसका नाम ‘साई बाबा’ बन गया।

साईबाबा अंत तक शिरडी में रहे। बाद में म्हालसापति उनके प्रबल भक्त बन गए। जितने लोग साईबाबा के आध्यात्मिक अधिकार और शक्ति के प्रति आश्वस्त हुए, एक महान संत के रूप में उनका नाम शिरडी गांव की सीमाओं से बहुत दूर फैल गया और शिरडी को एक पवित्र स्थान का दर्जा प्राप्त हुआ।

साईं बाबा ने अपने भक्तों को प्रार्थना करने, भगवान के नाम का जाप करने और पवित्र ग्रंथों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मुसलमानों को कुरान और हिंदुओं को रामायण, भगवद गीता और योग वशिष्ठ जैसे ग्रंथों का अध्ययन करने की सलाह दी। उन्होंने अपने भक्तों और अनुयायियों को नैतिक जीवन जीने, दूसरों की मदद करने, बिना किसी भेदभाव के हर जीव से प्यार करने और चरित्र की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं (श्रद्धा और सबुरी) विकसित करने का निर्देश दिया। उन्होंने नास्तिकता की आलोचना की।

साई बाबा का इतिहास

साईं बाबा हिंदू है या मुसलमान

साईं बाबा हिंदू है या मुसलमान धर्म के, यह कोई नहीं जानता। उन्होंने कभी भी हिन्दू या मुसलमान होने का दावा नहीं किया। हालांकि, उनकी वेशभूषा किसी मुस्लिम फकीर जैसी थी। वे शिरडी में एक पुरानी मस्जिद में रहते थे लेकिन उन्होंने उस मस्जिद को ‘द्वारकामाई’ नाम दिया और वहा हमेशा एक धूनी जलती रहती थी। भगवान जैसे शब्द ‘अल्लाह’, ‘अल्लामालिक’ अक्सर उनके मुंह से निकलते थे, लेकिन वे खुद राम की पूजा करते थे।

उनका व्यवहार धार्मिक मतभेदों से परे था। इसलिए उनके भक्तों में सभी धर्मों के लोग शामिल थे। वे हमेशा ‘सबका सालिक एक’, ‘श्रद्धा’ और ‘सबुरी’ का जाप करते थे। उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे खुद भगवान या भगवान का अवतार है।

साईं बाबा की वेशभूषा

साईं बाबा की वेशभूषा

साईं बाबा एक ढीला अंगरखा पहनते थे। उनकी वेशभूषा एक मुस्लिम फकीर जैसी थी। सिर पर फकीर की तरह कपड़ा बंधा हुआ रहता था। वे शिरडी गांव के घरों से भीख मांगते थे। उन्हे हमेशा चिलिम पीना पसंद था। उन्हें गूंगे जानवरों से भी बहुत लगाव था। द्वारकामाई में जलती धूनी की राख भक्तों को प्रसाद के रूप में दी जाती थी। अपनी कृपा से उन्होंने कई लोगों के कष्टों को दूर किया।

साई बाबा की मृत्यु

अगस्त 1918 में, शिरडी साईं बाबा ने अपने कुछ भक्तों से कहा कि वह जल्द ही ‘अपना नश्वर शरीर छोड़ देंगे’। सितंबर के अंत में, उन्हें तेज बुखार हुआ और उन्होंने खाना बंद कर दिया। जैसे-जैसे उनकी हालत बिगड़ती गई, उन्होंने अपने शिष्यों से उन्हे पवित्र ग्रंथ सुनाने के लिए कहा, हालाँकि उन्होंने आने-जाने वाले लोगों से मिलना भी जारी रखा था। लेकिन 15 अक्टूबर 1918 को उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई, उसी दिन विजयादशमी का त्योहार था।

उनके अवशेषों को शिरडी के बुटी वाड़ा में दफनाया गया था, जो बाद में एक पूजा स्थल बन गया जिसे आज श्री समाधि मंदिर या शिरडी साईं बाबा मंदिर के नाम से जाना जाता है। साई बाबा की मृत्यु के बाद, शिरडी में उनके समाधि-मंदिर में आने वालों की संख्या में वृद्धि जारी रही।

हालांकि, शिर्डी के अलावा उनके मंदिर देश में कई जगह बन चुके हैं। लेकिन साईबाबा के स्वयं शिर्डी में रहने के कारण ‘शिर्डी’ तीर्थ स्थान के रूप में विकसित हुआ। हर साल चैत्र शुद्ध नवमी पर यहां एक विशाल यात्रा आयोजित की जाती है।

शिरडी में साईं बाबा मंदिर की स्थापना

sai baba temple

साईं बाबा के दुनिया को अलविदा कहने के बाद उनके भक्तों ने शिरडी में साईं बाबा मंदिर की स्थापना की। 19वीं शताब्दी में, साईं भक्तों की संख्या सीमित थी और विदेशों से भक्त नहीं आते थे, जैसे आज आते हैं। आज साईं बाबा के कारण शिरडी भारत में एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है और प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थलों में गिना जाता है।

शिरडी के साईं बाबा मंदिर में प्रतिदिन औसतन 25,000 तीर्थयात्री आते हैं। धार्मिक त्योहारों के दौरान यह संख्या 1 लाख तक पहुंच जाती है। मंदिर का आंतरिक भाग और बाहरी शंकु दोनों ही सोने से ढके हुए हैं। मंदिर के अंदर, साईं बाबा की बेहद सुंदर मुर्ती मौजूद है।

sai baba of shirdi temple

मंदिर के सभा भवन के राइट साइड के शीशे के हॉल में चिलिम, हुक्का, सुरई, पादुका, छाता आदि साईं बाबा द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुएं रखी हुई हैं। मंदिर का प्रबंधन श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। साईं बाबा की पालकी का जुलूस हर गुरुवार को समाधि मंदिर से द्वारकामयी तक, चावड़ी से और वापस साईं बाबा मंदिर तक जाता है।

यह भी पढ़ें-

Related Posts