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रोस्टर सिस्टम क्या होता है

लंबे समय तक विश्वविद्यालयों ने अपनी स्वायत्तता का हवाला देते हुए आरक्षण को लागू करने से इनकार कर दिया, लेकिन जब सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी दबाव बनना शुरू हुआ, तो वे आरक्षण को लागू करने के लिए तैयार हो गए, लेकिन इसमें ऐसे तमाम हथकंडे अपनाए, ताकि यह ठीक से लागू नहीं किया जा सका। इसलिए रोस्टर सिस्टम बनाया गया है। सवाल यह है कि रोस्टर सिस्टम क्या है और यह कैसे काम करता है? आइए जानते हैं

रोस्टर सिस्टम क्या होता है

रोस्टर सिस्टम क्या होता है

2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू होने के दौरान केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के सामने विश्वविद्यालय में नियुक्तियों का मामला सामने आया था। केंद्र सरकार के डीओपीटी मंत्रालय ने दिसंबर 2005 में यूजीसी को एक पत्र भेजकर विश्वविद्यालयों में आरक्षण के कार्यान्वयन में विसंगतियों को दूर करने के लिए कहा।

उस पत्र के अनुसरण में, यूजीसी के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर वीएन राजशेखरन पिल्लई ने आरक्षण के कार्यान्वयन के लिए एक सूत्र तैयार करने के लिए प्रोफेसर रावसाहेब काले की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। जिसमें वकील प्रोफेसर जोश वर्गीज और यूजीसी के तत्कालीन सचिव डॉ आरके चौहान सदस्य थे।

इस कमेटी ने सब्बरवाल जजमेंट को आधार बनाकर 200 प्वाइंट का रोस्टर बनाया। इस रोस्टर में एक विश्वविद्यालय के सभी विभागों में तीन स्तरों पर कार्यरत सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर का एक संवर्ग बनाने की सिफारिश की गई थी।

इस समिति ने विश्वविद्यालय/महाविद्यालय को एक विभाग के बजाय एक इकाई मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की, क्योंकि विश्वविद्यालय उपरोक्त पदों पर नियुक्तियाँ करता है न कि उसका विभाग। विभिन्न विभागों में नियुक्त प्रोफेसरों का वेतन और सेवा शर्तें भी एक समान हैं, इसलिए समिति ने उन्हें एक संवर्ग मानने की सिफारिश की थी।

काले समिति ने 100 अंकों पर रोस्टर नहीं बनाया बल्कि 200 पॉइंट पर बनाया, क्योंकि जैसे अनुसूचित जातियों के लिए केवल 7.5 प्रतिशत आरक्षण है। यदि यह रोस्टर 100 पॉइंट पर बनता है तो अनुसूचित जाति को किसी विश्वविद्यालय में विज्ञापित किए जाने वाले 100 पदों में से 7.5 पद देने होंगे, जो संभव नहीं है।

विवाद का कारण

प्रो. काले समिति द्वारा बनाए गए इस रोस्टर ने विश्वविद्यालयों द्वारा की जा रही नियुक्तियों में आरक्षित वर्ग से सीटों की चोरी करना लगभग असंभव बना दिया, क्योंकि इसने यह भी तय कर लिया था कि यह पद किस समुदाय कोटे से भरा जाएगा। कुछ लोगों का मानना है की इस वजह से बीएचयू, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी, शांतिनिकेतन यूनिवर्सिटी समेत कई यूनिवर्सिटी इस रोस्टर के खिलाफ हो गई थीं।

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