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रामप्रसाद बिस्मिल कौन थे? उन्हे फांसी क्यों दी गई

एक वर्ष के क्रांतिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं प्रकाशित कीं। उन किताबों को बेचने से मिले पैसों से उन्होंने हथियार खरीदे और उन हथियारों का इस्तेमाल ब्रिटिश राज का विरोध करने के लिए किया। उनके जीवनकाल में 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से अधिकांश को सरकार ने जब्त कर ली। अगर आप नहीं जानते की, रामप्रसाद बिस्मिल कौन थे और Ramprasad Bismil का इतिहास क्या है? तो हम इस बारे में बताने जा रहे है।

रामप्रसाद बिस्मिल - Ramprasad Bismil

रामप्रसाद बिस्मिल कौन थे

रामप्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा के एक प्रमुख सेनानी थे, जिन्हें 30 साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी थी। वह मैनपुरी षडयंत्र और काकोरी-कांड जैसी कई घटनाओं में शामिल थे और एक सदस्य भी थे। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के। राम प्रसाद एक कवि, कवि, अनुवादक, बहुभाषी, इतिहासकार और साहित्यकार भी थे। बिस्मिल को तत्कालीन संयुक्त प्रांत आगरा और अवध में लखनऊ सेंट्रल जेल के बैरक नंबर 11 में रखा गया था। इस जेल में उनकी टीम के अन्य साथियों को एक साथ रखते हुए उन सभी पर ब्रिटिश राज के विरुद्ध षडयंत्र रचने का मुकदमा चलाया गया था।

राम प्रसाद बिस्मिल का इतिहास

11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर शहर के खिरनीबाग इलाके में जन्मे रामप्रसाद अपने पिता मुरलीधर और मां मूलमती की दूसरी संतान थे। उनसे पहले एक बेटा पैदा होते ही मर गया था। दोनों हाथों की दसों अंगुलियों में बच्चे की कुंडली और चक्र के लक्षण देखकर एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की – “अगर इस बच्चे की जान किसी तरह बच जाती है, हालांकि संभावना बहुत कम है, तो चक्रवर्ती सम्राट बनने से कोई नहीं दुनिया कर सकती है सत्ता रुकेगी नहीं।

माता-पिता दोनों सिंह राशि के थे और बच्चा भी सिंह-शावक जैसा दिखता था, इसलिए ज्योतिषियों ने बहुत ध्यान से सोचा और इसका नाम तुला राशि के ‘र’ के नाम पर रखने का सुझाव दिया। माता-पिता दोनों ही राम के उपासक थे, इसलिए बालक का नाम रामप्रसाद पड़ा। मां मूलमती हमेशा कहा करती थीं कि उन्हें राम जैसा पुत्र चाहिए। घर में सभी बच्चे को प्यार से राम कहकर बुलाते थे।

रामप्रसाद ने उर्दू मिडिल की परीक्षा पास न करने के बाद अंग्रेजी पढ़ना शुरू किया। साथ ही मोहल्ले के एक पुजारी ने रामप्रसाद को पूजा की विधि से अवगत कराया। पुजारी एक स्थापित विद्वान थे। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव रामप्रसाद के जीवन पर भी पड़ा। पुजारी की शिक्षाओं के कारण रामप्रसाद पूजा के साथ-साथ ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे। पुजारी को देख रामप्रसाद भी व्यायाम करने लगा।

राम प्रसाद बिस्मिल अपनी मातृभूमि शाहजहांपुर आए और पहले कुछ दिनों तक भारत सिल्क मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में मैनेजर के तौर पर काम किया, उसके बाद सदर बाजार में सिल्क साड़ी की दुकान खोली और बनारसीलाल के साथ कारोबार शुरू किया। व्यापार में उन्होंने नाम और नाम दोनों अर्जित किए। कांग्रेस जिला समिति उन्हें लेखा परीक्षक के रूप में कार्यकारी समिति में ले गई। सितंबर 1920 में, वह शाहजहांपुर कांग्रेस कमेटी के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में कलकत्ता कांग्रेस में शामिल हो गए। लाला लाजपत राय से उनकी मुलाकात कलकत्ता में हुई थी। लाला जी ने जब उनकी लिखी हुई पुस्तकें देखीं तो वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। फिर वह एक क्रांतिकारी बन गया।

राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी क्यों दी गई

ऐतिहासिक काकोरी कांड की घटना में राम प्रसाद बिस्मिल मुख्य सूत्रधार थे। इस योजना में उन्हे ट्रेन में मौजूद सरकारी खजाने को लूटना था। इस लूट में एक निर्दोष की गलती से गोली चलने से मौत हुई। इस प्रकरण को ब्रिटिश सरकार ने गंभीरता से लिया और 26 सितंबर 1925 की रात को बिस्मिल सहित उनके 40 से अधिक सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

यह काकोरी कांड कोर्ट में गया और फिर उन्हे फांसी की सजा सुनाई गई। 16 दिसंबर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा (अन्तिम समय की बातें) का अंतिम अध्याय पूरा किया और उसे जेल से बाहर भेज दिया। वह अंतिम बार 18 दिसंबर 1927 को अपने माता-पिता से मिले और सोमवार 19 दिसंबर 1927 को सुबह 6.30 बजे गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।

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