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प्रदोष काल का समय क्या होता है

प्रदोष व्रत भगवान शिवशंकर को समर्पित होता है। हिंदू धर्म के अनुसार प्रदोष व्रत बहुत ही शुभ होता है और कलियुग में शिव की कृपा प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि प्रदोष काल के दौरान, महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों की स्तुति करते हैं। जो कोई भी अपना कल्याण चाहता है वह यह व्रत रख सकता है। प्रदोष व्रत का पालन करने से सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं। सप्ताह के सात दिनों के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है। इस लेख एमन हम प्रदोष काल का समय क्या होता है जानेंगे।

प्रदोष काल का समय क्या होता है

सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल होता है। प्रदोष व्रत विधि के अनुसार लोगों को दोनों पक्षों की त्रयोदशी का व्रत करना चाहिए। निर्जल तथा निराहार व्रत सर्वोत्तम है, लेकिन यदि संभव न हो तो नक्तव्रत करें। दिन भर या तो कुछ भी न खाएं या क्षमता के अनुसार फल लें। इस दिन पूरे दिन भोजन नहीं करना चाहिए। सूर्यास्त के कम से कम 72 मिनट बाद हविष्यान्न ग्रहण कर सकते हैं। शिव पार्वती का ध्यान करने के बाद पूजा करें। प्रदोष काल में घी के कम से कम एक या 32 या 100 या 1000 दीपक जलाएं।

प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग-अलग हो सकता है। चूंकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय त्रयोदशी की प्रधानता पर निर्भर करता है। और दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनों शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी भिन्न हो सकता है।

प्रदोष व्रत की पूजा अपने शहर के सूर्यास्त के समय के अनुसार प्रदोष काल के दौरान करनी चाहिए। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा किए बिना भोजन नहीं करना चाहिए। व्रत के दौरान भोजन, नमक, मिर्च आदि का सेवन न करें। पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, बिल्वपत्र, शमी पात्र, फूल, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती और फलों से पूजा करें।

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