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न्याय से क्या तात्पर्य है

न्याय (Justice) का मूल सार लोगों को उनकी उचित मांगों के अनुसार न्याय देना है। यह स्पष्ट है कि न्याय की धारणा मनुष्य के समाज में रहने वाले सभी लोगों से संबंधित है। समाज के बाहर न्याय का कोई रूप मौजूद नहीं हो सकता। राजनीति विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है। समाज विज्ञान का महत्व समाज में अपनी न्यायपूर्ण भूमिका निभाने में ही है। इस लेख में हम न्याय से क्या तात्पर्य है (What is meant by Justice) जानेंगे।

न्याय से क्या तात्पर्य है

न्याय से क्या तात्पर्य है

न्याय से तात्पर्य समाज के हर घटक को भय से दूर रखना और सुरक्षित महसूस कराना है। न्याय की अवधारणा एक बड़े क्षेत्र की अवधारणा है। यह एक अवधारणा है जिसका अर्थ विद्वानों में सहमत नहीं है। न्याय की अवधारणा वास्तव में एक नैतिक अवधारणा है। नैतिकता या नैतिक सिद्धांत हमेशा के लिए स्थिर या समान नहीं हो सकते। जिसे कुछ लोग नैतिकता के रूप में देखते हैं, वह कुछ अन्य लोगों के लिए अनैतिक हो सकता है।

न्याय की अवधारणा व्यक्ति के उचित या तर्कसंगत अर्थ पर आधारित है। मनुष्य के अंतःकरण को जो अच्छा लगे, वह न्यायसंगत है और जो उसके अंतःकरण को नहीं भाता, वह उसकी दृष्टि में अन्याय है। न्याय की अवधारणा व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से समाज से संबंधित है। न्याय की अवधारणा के कई पहलू हैं और प्रत्येक पहलू की अपनी विशेषताएं हैं।

सामाजिक मूल्यों और मानवीय प्रवृत्ति के आधार पर कोई भी विचारधारा या सिद्धांत स्थायी या स्थिर नहीं हो सकता, उस सिद्धांत को स्थायी रूप से बनाए रखना संभव नहीं है। इसका कारण यह है कि सामाजिक स्थिति और मानव प्रवृत्ति समय और समय की परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।

जब हम कहते हैं कि मनुष्य की अंतरात्मा या सामाजिक मूल्यों से जो कुछ भी सही माना जाता है, हम वह हमें न्यायाधीश मानते हैं, तो जाहिर है कि न्याय की अवधारणा एक गतिशील अवधारणा है। न्याय की इस अवधारणा को परिवर्तनशील अवधारणा भी कहा जाता है क्योंकि समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन होना स्वाभाविक है।

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