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नूरजहाँ कौन थी? जानें, बेहद सुंदर Nur Jahan की कहानी

नूरजहां बेहद खूबसूरत होने के साथ-साथ तेज और अच्छी राजनयिक भी थी। साहित्य, कविता और ललित कलाओं में उनकी विशेष रुचि थी। उनका लक्ष्य भेद एकदम सही और सटीक था। कहा जाता है की 1619 ई. में उन्होंने एक ही गोली से शेर को मार डाला था। अगर आप नहीं जानते की, नूरजहाँ कौन थी और Nur Jahan का क्या इतिहास है तो हम इस आर्टिकल में बेहद कम शब्दों में उनकी कहानी बताने जा रहे है।

नूरजहाँ कौन थी - Nur Jahan का इतिहास

नूरजहाँ कौन थी

नूरजहाँ मुगल बादशाह जहाँगीर की अंतिम और मुख्य पत्नी थी और इतिहासकारों द्वारा माना जाता है कि उनके पति के अधिकांश शासनकाल में सिंहासन के पीछे असली शक्ति थी। नूरजहाँ का जन्म मेहर-उन-निस्सा के रूप में हुआ था, जो एक महान वज़ीर (मंत्री) की बेटी थी, जो अकबर के अधीन सेवा करता था। वह एकमात्र मुगल साम्राज्ञी थीं जिनके नाम पर सिक्का चल रहा था।

नूरजहां की कहानी

सत्रह वर्ष की आयु में, मेहरुन्निसा का विवाह ‘अलीकुली’ नाम के एक बहादुर ईरानी युवक से हुआ था, जिसे जहाँगीर के शासन की जागीर दी गई थी। 1607 ई. में जहांगीर के दूतों ने एक युद्ध में शेर अफगान को मार गिराया। मेहरुन्निसा को पकड़कर दिल्ली लाया गया और उसे सम्राट अकबर की विधवा रानी रुकैया बेगम की परिचारिका बना दिया गया।

मेहरुन्निसा को पहली बार जहांगीर ने नौरोज उत्सव के अवसर पर देखा था और उसकी सुंदरता से मुग्ध होकर, जहांगीर ने मई, 1611 ई. में उससे विवाह किया। शादी के बाद, जहाँगीर ने उन्हें ‘नूरजहाँ’ की उपाधि दी। 1613 ई. में नूरजहाँ को ‘बादशाह बेगम’ बनाया गया।

नूरजहाँ असाधारण रूप से सुंदर होने के साथ-साथ बुद्धिमान और विवेकपूर्ण भी थी। साहित्य, कविता और ललित कलाओं में उनकी विशेष रुचि थी। इन सभी गुणों के कारण उसने अपने पति पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। परिणामस्वरूप, जहाँगीर के शासन का सारा भार उस पर आ पड़ा। उसका नाम सिक्कों पर भी उकेरा जाने लगा और उसने परोक्ष रूप से शासन किया।

उसने अपने पहले पति से पैदा हुई बेटी का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे बेटे शहरयार से किया, और चूँकि जहाँगीर से उसकी कोई संतान नहीं थी, वह चाहती थी कि शहरयार जहाँगीर को सिंहासन पर बैठाए। नूरजहाँ की ये सारी हरकतें उसकी कूटनीति का हिस्सा थीं।

Nur Jahan की मृत्यु कब और कैसे हुई

जहाँगीर के जीवन काल में नूरजहाँ शक्ति सम्पन्न थी, किन्तु 1627 में जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका राजनीतिक प्रभुत्व नष्ट हो गया। नूरजहाँ की मृत्यु 18 दिसम्बर 1645 को 68 वर्ष की आयु में लाहौर, पाकिस्तान में हुई। उन्होंने अपना शेष जीवन अपनी मृत्यु तक लाहौर में बिताया। उनकी कलात्मक रुचि के प्रमाण उनके पिता एत्मादुद्दोला के अवशेषों पर आगरा में बनवाए गए भव्य और आकर्षक मकबरे में उपलब्ध हैं।

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