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निंदा प्रस्ताव क्या है

निंदा प्रस्ताव (Censure motion) के मामले में सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि यह परिषद के एक व्यक्तिगत सदस्य के लिए खतरा होता है, जबकि अविश्वास प्रस्ताव के मामले में जब पूरी सरकार भंग हो जाती है। अविश्वास प्रस्ताव के वैध होने के लिए उन्हें लोकसभा सदस्यों से बहुमत का समर्थन प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, जिसके बिना प्रस्ताव अमान्य है। इस लेख में हम, निंदा प्रस्ताव क्या है जानेंगे।

निंदा प्रस्ताव क्या है

निंदा प्रस्ताव, मुख्य रूप से एक बयान या वोट है जिसमें कहा गया है कि, कोई विशिष्ट व्यक्ति, सरकार या आंतरराष्ट्रीय तौर पर कोई देश, जिसने सामाजिक, राजकीय या नैतिक रूप से किसी गलत कार्य या विधि को किया है, जिसकी सदन में निंदा की जाती है। भारत में, संसद या राज्य विधानसभा में एक निंदा प्रस्ताव पेश किया जाता है। इसे विपक्ष द्वारा सरकार की एक विशिष्ट नीति या किसी मंत्री या मंत्रिपरिषद के विरुद्ध संसद में पेश किया जाता है। जिस विषय से जुड़ा प्रस्ताव होता है, उसपर चर्चा की जाती है।

निंदा प्रस्ताव किसी मंत्री, मंत्रिपरिषद या प्रधानमंत्री के खिलाफ लाया जा सकता है। यह लोकसभा में पारित होने पर मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं होती है। निंदा प्रस्ताव पारित होने पर सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। नवंबर 2019 में, 50 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान करने के लिए भाजपा सांसद प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे।

आंतरराष्ट्रीय तौर पर, रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान UN में निंदा प्रस्ताव पेश किया गया था, जिसमें रूस की यूक्रेन पर हमले के लिए निंदा की गई है। निंदा प्रस्ताव पारित होने पर किसी भी देश की सरकार पर कोई सीधे प्रभाव नहीं पड़ता है। हालांकि, ऐसे प्रस्ताव पास होने से देश की प्रतिमा धूमिल जरूर हो जाती है।

निंदा प्रस्ताव या अविश्वास प्रस्ताव दोनों संसद के किसी एक सदन या संसद के किसी एक सदन के सदस्य द्वारा पेश किए जाते हैं। संसद के दो सदन लोकसभा और राज्यसभा हैं। निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव दो पूरी तरह से अलग अवधारणाएं हैं। अविश्वास प्रस्ताव के मामले में, सरकार के खिलाफ यह कहते हुए वोट होता है कि, वे अब पद पर बने रहने और सत्ता का प्रयोग करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं, जबकि निंदा प्रस्ताव में ऐसा कोई खतरा नही होता है।

अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा के सभी परिषद सदस्यों के खिलाफ है, न कि विशेष रूप से केवल एक मंत्री के खिलाफ। कैबिनेट को अपनी शक्ति तब तक प्राप्त होती है जब तक उन्हें लोकसभा के बहुमत सदस्यों का विश्वास प्राप्त नहीं हो जाता। निंदा प्रस्ताव के मामले में ऐसा नहीं है। वोट परिषद के किसी विशेष सदस्य के खिलाफ हो सकता है।

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