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मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति किस रूप में की है? जानिये कहानी के साथ

मीराबाई सोलहवीं शताब्दी की कृष्ण भक्त और कवयित्री थीं। कृष्ण भक्ति के रंग में रंगने से उनकी कविता और गहरी हो जाती है। मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति के स्फुट छंदों की रचना की है। मीरा कृष्ण की भक्त है। उनके गुरु रविदास जी थे और रविदास जी के गुरु रामानंद जी थे। इस लेख में आप, मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति किस रूप में की है इसे जानेंगे।

मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति किस रूप में की है

मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति किस रूप में की है

मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति कृष्ण को प्रेमी मानकर प्रियतम रूप में की है। मीराबाई का जन्म वर्ष 1498 ई. में पाली के कुडकी गांव में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के यहां हुआ था। वह बचपन से ही कृष्ण भक्ति में रुचि लेने लगी थी। मीरा की शादी मेवाड़ के सिसोदिया राजघराने में हुई थी। उनके पति उदयपुर के महाराजा भोजराज थे, जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे।

शादी के कुछ समय बाद ही उसके पति की मौत हो गई। पति की मृत्यु के बाद पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, लेकिन मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुई। मीरा के पति का अंतिम संस्कार मीरा की अनुपस्थिति में चित्तौड़ में हुआ। पति की मृत्यु के बाद भी मीरा माता ने अपना श्रृंगार नहीं हटाया, क्योंकि वह कृष्ण को अपना पति मानती थीं।

मीरा अनासक्त हो गई और ऋषि-मुनियों की संगति में हरि कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगी। पति की मृत्यु के बाद उसकी भक्ति दिन-ब-दिन बढ़ती गई। वह मंदिरों में जाती थी और वहां मौजूद कृष्ण भक्तों के सामने कृष्ण की मूर्ति के सामने नृत्य करती थी। मीराबाई का कृष्ण की भक्ति में नाचना और गाना शाही परिवार को पसंद नहीं था।

परिवार के लोगों ने मीराबाई को जहर देकर कई बार मारने की कोशिश की। घरवालों के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन चली गई। वह जहां भी जाती थीं, लोगों ने उनका सम्मान किया। लोग उन्हें देवी की तरह प्यार और सम्मान देते थे। मीरा का समय महान राजनीतिक उथल-पुथल का समय रहा है। हिंदुस्तान पर बाबर का आक्रमण और प्रसिद्ध खानवा का युद्ध एक ही समय में हुआ था।

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