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करुण रस की परिभाषा

करुणा का स्थायी भाव शोक है, इस रस में स्वयं के विनाश या स्वयं के अलग होने, द्रव के विनाश और प्रेमी से अलग होने या दूर होने के कारण उत्पन्न होने वाले दुःख या पीड़ा को करुण रस (Karun Ras) कहा जाता है। वैसे तो जुदाई के श्रृंगार में भी दुख का अनुभव होता है, लेकिन जो दूर चला जाता है उससे फिर मिलने की आस रहती है। इस लेख में हम करुण रस की परिभाषा क्या है जानेंगे।

करुण रस की परिभाषा

करुण रसी की परिभाषा

करुण शब्द का प्रयोग सहानुभूति और करुणा के साथ मिश्रित दुःख की भावना को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, इसलिए जब स्थायी भावना दु: ख, भावना और संचारी भावना की मदद से व्यक्त करके स्वाद का रूप ले लेती है, तो उसकी परिणति करुण रस कहलाती है। करुणा की स्थायी भावना शोक है।

जब किसी प्रिय वस्तु या किसी वस्तु के खोने पर शोक से हृदय भर जाता है या उसे कोई हानि होती है तो ‘करुण रस’ समाप्त हो जाता है। इसमें विभव, अनुभव और संवादात्मक भावों के मेल से शोक की स्थायी अनुभूति का संचार होता है।

जहां फिर से मिलने की उम्मीद खत्म हो जाती है, उसे करुणा रस कहते हैं। इसमें सांस फूलना, छाती पीटना, रोना, जमीन पर गिरना आदि की भावना व्यक्त की जाती है। किसी प्रियजन की लंबी जुदाई या मृत्यु के कारण उत्पन्न होने वाले दुःख को करुणा रस कहा जाता है।

अपनों के बिछड़ जाने या ऐसी ही कोई प्रिय वस्तु खराब हो जाने पर व्यक्ति में शोक की अनुभूति होती है। उस भावना को करुणा रस कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार अशोक नाम का स्थायी भाव जब अपने अनुकूल स्पंदनात्मक अनुभव और संप्रेषणीय अनुभूति के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करता है, जब वह स्वाद का रूप धारण कर लेता है तो उसकी परिणति करुणामय रस में होती है।

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