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काकोरी कांड क्या है | Kakori Kand कब और कहाँ हुआ था

काकोरी कांड के सभी आरोपी लखनऊ जेल में बंद थे। मामला चल रहा था इसी दौरान बसंत पंचमी का त्योहार आ गया। क्रांतिकारियों ने अपने नेता राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ से कहा – पंडित जी, कल के लिए एक फड़फड़ाती कविता लिखें। वो कविता थी, मेरा रंग दे बसंती चोल….
हाँ मेरे रंग दे बसंती छोला.. अगर आप नहीं जानते की, काकोरी कांड क्या है, यह कांड कब – कहा हुआ और Kakori Kand में फांसी किन किनको हुई? तो यह सब घटना हम विस्तार से बताने जा रहे है।

काकोरी कांड क्या है - Kakori Kand

काकोरी कांड क्या है

काकोरी कांड की घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों द्वारा 9 अगस्त 1925 को हुए ब्रिटिश राज के खिलाफ युद्ध में हथियार खरीदने के लिए ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूटने की योजना थी। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था। राम प्रसाद बिस्मिल ने शाहजहांपुर में हुई बैठक के दौरान क्रांतिकारियों द्वारा चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने के लिए धन की तत्काल व्यवस्था की आवश्यकता के बारे में ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूटने की योजना बनाई थी।

Kakori Kand में कौन – कौन शामिल

8 अगस्त को राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के घर हुई आपात बैठक में निर्णय लेकर योजना बनाई गई। जिसमें अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को हरदोई शहर के रेलवे स्टेशन से 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग सवार होंगे। जिसमें बंगाल से शाहजहांपुर से बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, मुरारी शर्मा और बनवारी लाल, राजेंद्र लाहिडी, शचींद्रनाथ बख्शी और केशव चक्रवर्ती, औरैया से चंद्रशेखर आजाद और मनमथनाथ गुप्ता और मुकुंदी लाल शामिल थे।

काकोरी कांड कब और कहाँ हुआ था

काकोरी कांड 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन पर हुआ था। इस योजना के अनुसार, पार्टी के एक प्रमुख सदस्य राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन” को चेन खींचकर और अशफाक उल्ला खान के नेतृत्व में रोक दिया। क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने पंडित चंद्रशेखर आजाद और 6 अन्य साथियों की मदद से पूरे लौह पथ गामिनी पर छापा मारकर सरकारी खजाने को लूट लिया।

ट्रेन को लूटने के लिए क्रांतिकारियों के पास पिस्तौलों के अलावा चार जर्मन निर्मित माउजर भी थे, जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से यह एक छोटी स्वचालित राइफल की तरह दिखती थी और सामने वाले के मन में भय पैदा करती थी। इन माउजर की मारक क्षमता भी अधिक थी।

मनमथनाथ गुप्ता ने जिज्ञासावश माउजर का ट्रैगर को दबा दिया, जिससे छूटी हुई गोली अहमद अली नाम के एक यात्री को जा लगी। वह मौके पर ही गिर पड़ा। झटपट चांदी के सिक्कों और नोटों से भरे चमड़े के थैलों को चादरों में बांध दिया और वहां से बचने के लिए एक चादर वहीं छोड़ दी। अगले दिन अखबारों के जरिए यह खबर पूरी दुनिया में फैल गई। इस ट्रेन डकैती को ब्रिटिश सरकार ने काफी गंभीरता से लिया।

काकोरी कांड में फांसी

इस काकोरी कांड के बाद उनकी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुल 40 क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाने को लूटने और यात्रियों की हत्या का मामला शुरू किया, जिसमें राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह उन्हें मौत की यानि फांसी की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में 16 अन्य क्रांतिकारियों को न्यूनतम 4 वर्ष कारावास से लेकर अधिकतम ‘काला पानी’ अर्थात आजीवन कारावास तक की सजा दी गई थी।

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