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गुरु घासीदास कौन थे? जानिए, उनकी जन्म से लेकर मृत्यु तक की कहानी

गुरु घासीदास जानवरों से भी प्रेम करना सिखाया करते थे। वह उनके साथ क्रूर व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गुरु घासीदास के महान संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ा था। अगर आप नहीं जानते की, गुरु घासीदास बाबा कौन थे, उनका जन्म कब – कहा हुआ और Guru Ghasidas Baba की मृत्यु कहा – कब हुई? तो हम इस आर्टिकल में इन सभी सवालों का जवाब देने जा रहे है।

गुरु घासीदास बाबा कौन थे, उनका जन्म कब - कहा हुआ - Guru Ghasidas Baba

गुरु घासीदास कौन थे

गुरु घासीदास एक अवतारी महापुरुष थे, जो सतनाम धर्म या सतनामी समाज के के प्रवर्तक बने। गुरु घासीदास जी महाराज ने समाज में व्याप्त जातिगत असमानताओं को खारिज कर दिया। उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व को खारिज कर दिया और जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक रूप से समान दर्जा प्राप्त है। उन्होंने मूर्तियों की पूजा पर रोक लगा दी थी। उनका मानना था कि उच्च जाति के लोगों और मूर्ति पूजा के बीच घनिष्ठ संबंध है।

गुरु घासीदास का जन्म कब हुआ था

गुरु घासीदास जी का जन्म 18 दिसम्बर 1756 को ग्राम गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महुंगदास जी एवं माता अमरौतिन के स्थान पर हुआ था। गुरु घासीदास जानवरों से भी प्रेम करना सिखाया करते थे। वह उनके साथ क्रूर व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उनके के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ा। 1901 की जनगणना के अनुसार उस समय लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ में शामिल हुए थे और गुरु घासीदास के अनुयायी थे।

बाबा की जन्म कथा

सन् 1672 में साध बीरभान और जोगीदास नाम के दो भाइयों ने वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर सतनामी साध मत का प्रचार किया। सतनामी साध मत के अनुयायी किसी भी इंसान का सम्मान करते थे लेकिन किसी के आगे झुकना नहीं के सिद्धांत में विश्वास करते थे।

एक बार एक किसान ने झुककर तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के नौकर को अपना अपमान समझकर सलामी नहीं दी, उसने उस पर डंडे से हमला कर दिया, जिसके जवाब में उस सतनामी साध ने उस नौकर को भी डंडे से पीटा। यह विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ और धीरे-धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब के पास पहुंचा कि सतनामियों ने बगावत कर दी थी।

यहीं से औरंगजेव और सतनामी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। युद्ध कई दिनों तक चला जिसमें शाही सेना को निहत्थे सतनामी समूह द्वारा पराजित किया जा रहा था। शाही सेना में यह खबर भी फैल गई कि सतनामी समूह कोई जादू टोना करके शाही सेना को हरा रहे हैं। इसके लिए औरंगजेब ने कुरान की आयतें लिखकर अपने सैनिकों को ताबीज भी बांधा था, लेकिन इसके बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा।

लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि सतनामी साधकों के पास आध्यात्मिक शक्ति के कारण यह स्थिति थी। सतनामी साधुओं की तपस्या का समय समाप्त होने के कारण उनमें अद्भुत शक्ति थी और उन्होंने गुरु के सामने समर्पण कर वीरगति को प्राप्त किया। शेष सतनामी सैनिक पंजाब, मध्य प्रदेश की ओर चले गए।

संत घासीदास जी का जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ में मध्य प्रदेश में हुआ था और वहाँ उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार और प्रचार किया। गुरु घासीदास का जन्म 1756 में बलौदाबाजार जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। जिसका असर आज तक देखने को मिल रहा है। उनकी जयंती हर साल 18 दिसंबर को पूरे छत्तीसगढ़ में मनाई जाती है।

गुरु घासीदास की मृत्यु कब हुई

गुरु घासीदास की मृत्यु की तारीख 1850 बताई जाती है, कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद नहीं है की उन्होंने कहा और कब अपना देह छोड़ा। जातियों में भेदभाव और समाज में भाईचारे की कमी देखकर गुरु घासीदास को बहुत दुख हुआ। समाज को इससे मुक्त कराने के लिए वह लगातार प्रयास करते रहे। लेकिन उन्हें इसका कोई समाधान नजर नहीं आया। सत्य की खोज के लिए उन्होंने गिरौदपुरी के जंगल में छतरी पहाड़ी पर समाधि बनाई, इसी बीच गुरु घासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया और सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लंबी तपस्या भी की।

Guru Ghasidas Baba की सात शिक्षाएँ

गुरु घासीदास जी की सात शिक्षाएँ इस प्रकार है –

  1. नशा कभी नहीं करना चाहिए।
  2. जीव हत्या नहीं करना चाहिए।
  3. सतनाम् पर विश्वास रखना चाहिए।
  4. मांसाहार नहीं करना चाहिए।
  5. व्यभिचार नहीं करना चाहिए।
  6. चोरी, जुआ से दूर रहना चाहिए।
  7. जाति-पाति के प्रपंच में नहीं पड़ना।

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