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गणेश चतुर्थी कब क्यों मनाई जाती है

गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन, हिन्दू धर्मिय लोग एकसाथ आकर भगवान गणेश जी की दैनिक प्रार्थना करके प्रसाद को बांटते है। इस प्रसाद में मोदक जैसी मिठाइयाँ शामिल होती हैं क्योंकि इसे भगवान गणेश का पसंदीदा माना जाता है। त्योहार शुरू होने के दसवें दिन समाप्त होता है, जब एक सार्वजनिक जुलूस में मूर्ति को संगीत और समूह के साथ नदी या समुद्र जैसे पानी में मूर्ति को विसर्जित कर दिया जाता है। इस लेख में हम गणेश चतुर्थी कब क्यों मनाई जाती है जानेंगे।

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी कब क्यों कैसे और कहा मनाई जाती है

गणेश चतुर्थी कब क्यों मनाई जाती है

गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है, एक हिंदू त्योहार है जो अपनी मां देवी पार्वती / गौरी के साथ कैलाश पर्वत से गणेश के पृथ्वी पर आने का जश्न माना जाता है। इसके साथ इसी दिन गणेश जी का जन्म हुआ था, इसी मान्यता के साथ भी गणेश चतुर्थी के पर्व पर यह त्योहार मनाया जाता है। पहले त्योहार को निजी तौर पर घरों में मनाया जाता था, लेकिन स्वातंत्र्य पूर्व काल में सार्वजनिक रूप से श्री बाल गंगाधर तिलक ने गणेश मिट्टी की मूर्तियों की स्थापना करके बड़े धूमधाम से गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाने की प्रथा स्थापित की, जो आज भी बरकरार है।

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी कब क्यों कैसे और कहा मनाई जाती है

गणेश चतुर्थी कहा मनाई जाती है

इसके बाद मिट्टी की मूर्ति विसर्जित हो जाती है और माना जाता है कि गणेश कैलाश पर्वत पर पार्वती और शिव के पास लौट आए। यह त्योहार भगवान गणेश को नई शुरुआत के देवता और बाधाओं के निवारण के साथ-साथ ज्ञान और बुद्धि के देवता के रूप में मनाता है और पूरे भारत में मनाया जाता है, खासकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में इसका जल्लोष देखने लायक होता है।

इन राज्यों के साथ भारत के बाकी राज्यों मे भी यह त्योहार मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी नेपाल में और हिंदू प्रवासी द्वारा भारत के बाहर जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया,मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मनाया जाता है।

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी कब क्यों कैसे और कहा मनाई जाती है

महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी को गणेशोत्सव के नाम से जाना जाता है। परिवार त्योहार के दौरान पूजा के लिए मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियां स्थापित करते हैं। मूर्ति की पूजा सुबह और शाम को फूल, दूर्वा (युवा घास की किस्में), करंजी और मोदक (चावल के आटे की पकौड़ी में लिपटे गुड़ और नारियल के गुच्छे) के प्रसाद के साथ की जाती है। पूजा गणेश, अन्य देवताओं और संतों के सम्मान में एक आरती गायन के साथ समाप्त होती है।

महाराष्ट्र में 17वीं सदी के संत समर्थ रामदास द्वारा रचित मराठी आरती “सुखकर्ता दुखहर्ता” गाई जाती है। उत्सव को समाप्त करने के बारे में पारिवारिक परंपराएं भिन्न होती हैं। घरेलू उत्सव देड़ दिन से लेकर ग्यारह दिनों के बाद समाप्त होते हैं। उस समय मूर्ति को औपचारिक रूप से विसर्जन के लिए पानी में विसर्जित किया जाता है। अकेले मुंबई में सालाना लगभग 150,000 से अधिक मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।

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