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अश्वगंधा की खेती कैसे करें | Ashwagandha खेती की संपूर्ण जानकारी

अश्वगंधा, भारतीय सदाबहार झाड़ी है जो भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बढ़ती है। यद्यपि आयुर्वेद में एक औषधीय जड़ी बूटी के रूप में उपयोगी माना जाता है और कई देशों में आहार पूरक के रूप में बेचा जाता है, Medlineplus अनुसार इस बात के अपर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि यह किसी भी बीमारी के इलाज के लिए सुरक्षित या प्रभावी है। इस लेख में, Ashwagandha खेती की संपूर्ण जानकारी में अश्वगंधा की खेती कैसे करें और खेती करने का समय, तरीका और कमाई संबंधी बातों को विस्तार से जानेंगे।

अश्वगंधा की खेती कैसे करें | Ashwagandha खेती की संपूर्ण जानकारी

अश्वगंधा की खेती कैसे करें

अश्वगंधा एक द्विबीजपत्री पौधा है। जो सोलानेसी परिवार का पौधा है। सोलानेसी परिवार की लगभग 3000 प्रजातियाँ पूरे विश्व में पाई जाती हैं। तथा ९० वंश पाए जाते हैं। इसमें से भारत में केवल 2 प्रजातियां ही पाई जाती हैं। इस प्रजाति के पौधे सीधे, अत्यधिक शाखाओं वाले, सदाबहार और झाड़ीदार 1.25 मीटर लम्बे पौधे होते हैं। पत्तियां यौवन, अण्डाकार होती हैं। फूल हरे, पीले और छोटे होते हैं और पांच के समूहों में व्यवस्थित होते हैं।

इसका फल एक बेरी होता है जो दूध युक्त मटर के समान होता है। जो पकने पर लाल हो जाता है। जड़ें 30-45 सेमी लंबी 2.5-3.5 सेमी मोटी मूली के समान होती हैं। इनकी जड़ों का बाहरी रंग भूरा और अंदर से सफेद होता है। भारत में अश्वगंधा जड़ों का उत्पादन प्रति वर्ष 2000 टन है। जबकि जड़ की मांग सालाना 7,000 टन है। मध्य प्रदेश के उत्तर पूर्व भाग में लगभग 4000 हेक्टेयर भूमि पर अश्वगंधा की खेती की जा रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के जिलों में अश्वगंधा की खेती की जाती है।

अश्वगंधा की खेती का समय

अश्वगंधा की खेती का समय खरीफ फसल का होता है। पौधो के अच्छे विकास के लिये 20-35 डिग्री तापमान 550-750 मिमी0 वार्षिक वर्षा होना आवश्यक है। पौधे की बढ़वार के समय शुष्क मौसम एंव मृदा में प्रचुर नमी की होना आवश्यक होता है। शरद ऋतु में 1-2 वर्षा होने पर जड़ों का विकास अच्छा होता है। पर्वतीय क्षेत्रों की अनउपजाऊ भूमि पर भी इसकी खेती को सफलता पूर्वक किया जा सकता है। शुष्क क्रषि के लिये भी अश्वगंधा की खेती उपयुक्त है।

अगस्त और सितम्बर माह में जब वर्षा हो जाऐ उसके बाद जुताई करनी चाहिये। दो बार कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद पाटा लगा देना चाहिये। 10-12 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। अच्छी पैदावार के लिये पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी0 तथा लाइन से लाइन की दूरी 20 सेमी0 रखना चाहिये। सामान्यतः बीज का अंकुरण 6-7 दिन के बाद प्रारम्भ हो जाता है।

अश्वगंधा के अपरिपक्व बीज को बुवाई हेतु नहीं चुनना चाहिए, क्यांेकि इनका भूर्ण परिपक्व नहीं हो पाता है। 8-12 महीने पुराने बीज का जमाव 70-80 प्रतिशत तक होता है। बीज के अच्छे अंकुरण के लिये आई.ए.ए., जी.ए.3 अथवा थायोयूरिया का प्रयोग करना चाहिये। नर्सरी को सतह से 5-6 इंच ऊपर उठाकर बनाया जाता है। जिससे कि नर्सरी में जलभराव की समस्या उत्पन्न न हो बीज बोने से पहले नर्सरी को शोधित करने के लिये डाइथेन एम-45 के घोल का प्रयोग करना चाहिये।

जैविक विधि से नर्सरी को उपचारित करने के लिये गोमूत्र का प्रयोग किया जाता है। नर्सरी में गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिये, जिससे कि बीजों का अंकुरण अच्छा हो बीजो को लाइन में 1-1.25 सेमी0 गहराई में डालना चाहिये। नर्सरी में बीज की बुवाई जून माह में की जाती है। बीजों में 6-7 दिनों में अंकुरण शुरू हो जाता है। जब पौधा 6 सप्ताह का हो जाये तब इसे खेत में रोपित कर देना चाहिये।

अश्वगंधा की खेती करने का तरीका

अश्वगंधा यह देर से आने वाली खरीफ फसल है। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए 20-35 डिग्री तापमान पर 500-750 मिमी की वार्षिक वर्षा आवश्यक है। पौधे की वृद्धि के दौरान शुष्क मौसम और मिट्टी में प्रचुर मात्रा में नमी होना आवश्यक है। शरद ऋतु में 1-2 वर्षा होने पर जड़ों का विकास अच्छा होता है। पहाड़ी क्षेत्रों की बंजर भूमि पर भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। अश्वगंधा की खेती भी शुष्क कृषि के लिए उपयुक्त है।

अश्वगंधा की खेती करने का तरीका
How to cultivate Ashwagandha

अगस्त और सितंबर में बारिश के बाद जुताई कर देनी चाहिए। कल्टीवेटर से दो बार जुताई करने के बाद पैड लगाना चाहिए। बीज दर 10-12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है। अच्छी उपज के लिए पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी और लाइन से लाइन की दूरी 20 सेमी होनी चाहिए।आमतौर पर बीजों का अंकुरण 6-7 दिनों के बाद शुरू हो जाता है। अश्वगंधा के अपरिपक्व बीजों को बुवाई के लिए नहीं चुना जाना चाहिए, क्योंकि उनके भ्रूण परिपक्व नहीं होते हैं।

8-12 महीने पुराने बीज का जमाव 70-80% तक होता है। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए IAA, GA 03 या थाउरिया का प्रयोग करना चाहिए। नर्सरी को सतह से 5-6 इंच ऊपर उठाकर बनाया जाता है। ताकि नर्सरी में जलभराव की समस्या न हो, बीज बोने से पहले नर्सरी को शुद्ध करने के लिए डाइथेन एम-45 के घोल का प्रयोग करना चाहिए।

गोमूत्र का उपयोग जैविक विधि से नर्सरी के उपचार के लिए किया जाता है। गोबर की खाद का प्रयोग नर्सरी में करना चाहिए, ताकि बीजों का अंकुरण अच्छा हो, बीज को 1-1.25 सेमी गहराई पर लाइन में लगाना चाहिए। नर्सरी में बीज की बुवाई जून के महीने में की जाती है। 6-7 दिनों में बीज अंकुरित होने लगते हैं। जब पौधा 6 सप्ताह का हो जाए तो उसे खेत में लगा देना चाहिए।

अश्वगंधा की खेती से कमाई

एक हेक्टेयर में अश्वगंधा पर अनुमानित व्यय रु. 10000/- आता है जबकि लगभग 5 क्विंटल जड़ों तथा बीज का वर्तमान विक्रय मूल्य लगभग 78,750 रुपये होता है। इसलिए शुद्ध-लाभ 68,750 रुपये प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। उन्नत प्रजातियों में यह लाभ और अधिक हो सकता है।

एक हेक्टेयर में अश्वगंधा पर अनुमानित खर्च रु. 10000/- जबकि लगभग 5 क्विंटल जड़ और बीज का वर्तमान बिक्री मूल्य लगभग 78,750 रुपये है। इसलिए शुद्ध लाभ 68,750 रुपये प्रति हेक्टेयर है। आने वाले विकसित प्रजातियों में यह लाभ ज्यादा हो सकता है। उम्मीद करते है की इस लेख के माध्यम से, Ashwagandha खेती की संपूर्ण जानकारी में अश्वगंधा की खेती कैसे करें और खेती करने का समय, तरीका और कमाई संबंधी आपको कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिली होगी।

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