Menu Close

चिपको आंदोलन किसने चलाया था

चिपको आंदोलन (Chipko Andolan) एक पर्यावरण-संरक्षण आंदोलन था। यह भारतीय राज्य उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा) में किसानों द्वारा पेड़ों की कटाई का विरोध करने के लिए किया गया था। वे राज्य वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपने पारंपरिक अधिकारों का दावा कर रहे थे। इस लेख में हम चिपको आंदोलन किसने चलाया था और क्यों चिपको आंदोलन‘ हुआ था, उसका महत्व क्या था? इन सभी बातों का जवाब जानेंगे।

चिपको आंदोलन किसने चलाया था

यह आंदोलन वर्ष 1973 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में शुरू हुआ था। एक दशक के भीतर यह पूरे उत्तराखंड क्षेत्र में फैल गया था। चिपको आंदोलन का एक मुख्य बिंदु यह था कि इसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

चिपको आंदोलन किसने चलाया था

चिपको आंदोलन 1973 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेत्रत्व में चलाया गया था। चिपको आंदोलन राज्य के चमोली जिले के गोपेश्वर नामक स्थान पर शुरू हुआ था। वनों की अंधाधुंध और अवैध कटाई को रोकने के लिए वर्ष 1972 में आंदोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन में महिलाओं का भी विशेष योगदान था और इस दौरान कई नारे भी मशहूर हुए और आंदोलन का हिस्सा बने।

इस आंदोलन में गांव के पुरुष और महिलाएं वनों की कटाई को रोकने के लिए पेड़ों से चिपके रहते थे और ठेकेदारों को पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं थी। जिस समय यह आंदोलन चल रहा था उस समय केंद्र की राजनीति में माहौल एक एजेंडा बन गया था। इस आंदोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया।

इस अधिनियम के तहत जंगल की रक्षा करना और पर्यावरण को जीवंत बनाना है। कहा जाता है कि चिपको आंदोलन के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1980 में एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों को काटने पर 15 साल का प्रतिबंध लगाया गया था। चिपको आंदोलन न केवल उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में फैल गया था और इसका असर दिखाई देने लगा था।

चिपको आंदोलन का महत्व

चिपको आंदोलन में जंगलों की रक्षा के लिए महिलाएं एक हफ्ते तक दिन-रात पेड़ों से चिपकी रहीं। चिपको आंदोलन महात्मा गांधी के आदर्शों पर शांतिपूर्वक शुरू किया गया विरोध था। इसमें कोई नारेबाजी और कोई हिंसा नहीं थी। यह शक्तिशाली विरोध बिना किसी शोर-शराबे के शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

गांधी विचारधारा के सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन की शुरुआत की थी। उन्होंने फिर से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से इन पेड़ों को न काटने और जंगल की रक्षा करने की अपील की। उनकी अपील को स्वीकार कर लिया गया और परिणामस्वरूप इन पेड़ों को काटने के लिए 15 साल का प्रतिबंध लगा दिया गया।

यह भी पढ़े –

Related Posts

error: Content is protected !!