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चौधरी चरण सिंह कौन थे? जानें, Chaudhary Charan Singh की जीवनी

कांग्रेस के लोहार अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ, जिससे युवा चौधरी चरण सिंह राजनीति में सक्रिय हो गए। उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तो उन्होंने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका समर्थन किया। जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। अगर आप नहीं जानते की, चौधरी चरण सिंह कौन थे और Chaudhary Charan Singh के इतिहास के जीवनी की क्या कहानी है? तो इस आर्टिकल को पूरा पढ़े।

 चौधरी चरण सिंह कौन थे और Chaudhary Charan Singh के इतिहास के जीवनी की क्या कहानी

चौधरी चरण सिंह कौन थे

चौधरी चरण सिंह एक किसान राजनीतिज्ञ और भारत के पांचवें प्रधानमंत्री थे। वे इस पद पर 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक रहे। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीयता और ग्रामीण परिवेश की मर्यादा में जिया। चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को एक जाट परिवार में हुआ था। स्वतंत्रता के समय उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। इस दौरान उन्होंने बरेली की जेल से डायरी की दो किताबें भी लिखीं। आजादी के बाद वे राम मनोहर लोहिया के ग्रामीण सुधार आंदोलन में शामिल हो गए।

Chaudhary Charan Singh का इतिहास

चौधरी चरण सिंह के पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत के रूप में चरण सिंह को सौंप दिया। चरण सिंह के जन्म के 6 साल बाद चौधरी मीर सिंह का परिवार नूरपुर से जानी खुर्द आ गया और भूपगढ़ी में बस गया। इसी माहौल में चौधरी चरण सिंह के युवा हृदय में गांव-गरीब-किसान के शोषण के खिलाफ संघर्ष के बीज बोए गए थे।

आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर 1928 में चौधरी चरण सिंह ने गाजियाबाद में ईमानदारी, स्पष्टता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ वकालत शुरू की। वकालत जैसे पेशेवर पेशे में भी वो उन्हीं मामलों को स्वीकार करते थे जिनमें मुवक्किल का पक्ष न्यायसंगत होता था। 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा से प्रभावित होकर युवा उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया।

1930 में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत नमक कानून तोड़ने का आह्वान किया। गांधी जी ने दांडी मार्च किया था। स्वतंत्रता प्रेमी चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा पर बहने वाली हिंडन नदी पर नमक बनाया। नतीजतन, चरण सिंह को 6 महीने की सजा सुनाई गई। जेल से लौटने के बाद, चरण सिंह ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया। चरण सिंह को 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी गिरफ्तार किया गया था और अक्टूबर 1941 में मुक्त कर दिया गया था। इस समय पूरे देश में असंतोष था। महात्मा गांधी ने करो या मरो का आह्वान किया था।

चौधरी चरण सिंह की जीवनी

अंग्रेजों के भारत छोड़ो की आवाज पूरे भारत में गूंजने लगी। 9 अगस्त 1942 को अगस्त क्रांति के माहौल में युवा चरण सिंह भूमिगत हो गए और गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, मवाना, सरथाना, बुलंदशहर के गांवों में एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाया। मेरठ कमिश्नरेट में युवा चरण सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ ब्रिटिश शासन को बार-बार चुनौती दी। मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया था।

एक तरफ पुलिस चरण सिंह की टोह लगाती थी तो दूसरी तरफ युवक चरण सिंह जनता के बीच सभा कर निकल जाता था। आखिरकार पुलिस ने एक दिन चरण सिंह को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें राजबंदी के रूप में डेढ़ साल की सजा सुनाई गई थी। जेल में ही चौधरी चरण सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “शिष्टाचार” भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के नियमों का एक मूल्यवान दस्तावेज है।

Chaudhary Charan Singh की कहानी

Chaudhary Charan Singh को किसानों का नेता माना जाता है। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याण सिद्धांत पर आधारित था। 1 जुलाई 1952 को उनके कारण यूपी में जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई और गरीबों को अधिकार मिल गया। उन्होंने एकाउंटेंट का पद भी बनाया। किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण अधिनियम पारित करवाया। वे 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 17 अप्रैल 1968 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

मध्यावधि चुनाव में उन्हें अच्छी सफलता मिली और फिर 17 फरवरी 1970 को वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वे केंद्र सरकार में गृह मंत्री बने, फिर उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उप प्रधान मंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों और कांग्रेस (यू) के समर्थन से प्रधानमंत्री बने।

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