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भ्रामक संप्रेषण क्या है | भ्रामक संप्रेषण से होने वाले प्रभाव

सम्प्रेषण की यह प्रक्रिया मानवीय समाज और उसके व्यवहार के कारण सीधी -सरल न होकर अत्यन्त व्यापक एवं जटिल है। भाषा के माध्यम से मनुष्य केवल अपेक्षित अर्थ – ही व्यक्त नहीं करता अपितु श्रोता के साथ अपने सम्बन्धों को भी प्रकट करता है। इस लेख में हम भ्रामक संप्रेषण क्या है या संप्रेषण किसे कहते हैं और भ्रामक संप्रेषण से होने वाले प्रभाव क्या है जानेंगे।

भ्रामक संप्रेषण क्या है और भ्रामक संप्रेषण से होने वाले प्रभाव

‘बैठ जा’ ‘विराजिए’, ‘तशरीफ रखिए’, ‘स्थान ग्रहण कीजिए’ आदि प्रयोग मूलतः बैठने के अर्थ को सम्प्रेषित करते हैं साथ ही श्रोता की स्थिति, वक्ता के साथ उसके सम्बन्ध और सन्दर्भ आदि का भी सम्प्रेषण करते हैं। सम्प्रेषण में इन चारों की परस्पर सहभागिता ही सम्प्रेषण को सफल बना सकती है अन्यथा सम्प्रेषण से कहीं न कहीं अस्पष्टता, भ्रामकता और अपूर्णता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में यदि वक्ता, श्रोता, माध्यम या संदेश के स्तर पर कोई व्यवधान रहता है तो सम्प्रेषण की प्रक्रिया अपने में पूर्ण नहीं होगी।’

भ्रामक संप्रेषण क्या है

भ्रामक सम्प्रेषण, सम्प्रेषण की प्रक्रिया की वह स्थिति है जब वक्ता द्वारा भेजा गया संदेश अभिप्रेत अर्थ में श्रोता तक नहीं पहुँचता। डब्ल्यू. एच. व्हाइट के शब्दों में- ‘संदेशवाहन का सबसे बड़ा शत्रु अथवा यों कहें कि संदेश वाहन की सफलता में सबसे बड़ी बाधा भ्रम की होती है।’ भ्रामक सम्प्रेषण सयास भी हो सकता है और वक्ता – श्रोता – संदेश – माध्यम में किसी भी बिंदु पर किसी बाधा या व्याघात के कारण भी हो सकता है।

वक्ता और श्रोता की भाषाई दक्षता सम्प्रेषण में भ्रामकता और अस्पष्टता का प्रमुख कारण हो सकता है। वक्ता द्वारा यदि संदर्भ के अनुसार उचित भाषा का उपयोग नहीं किया जाता तो संदेश सही रूप में श्रोता तक नहीं पहुँचता क्योंकि समाज में आयु, लिंग, वर्ण, अवस्था आदि के आधार पर भाषा – दक्षता में भिन्नता स्वाभाविक रूप से मिलती है।

भ्रामक संप्रेषण से होने वाले प्रभाव

भ्रामक संप्रेषण से वक्ता और श्रोता में संभाषण का अनिष्ट प्रभाव पड़ता है। वक्ता किस प्रकार के श्रोता के लिए संदेश सम्प्रेषित कर रहा है उसकी भाषा का प्रयोग इस बात पर निर्भर करता है। यदि विभिन्न सामाजिक स्थितियों के अनुरूप भाषा का प्रयोग नहीं किया जाए तो या तो सम्प्रेषण अपूर्ण और अस्पष्ट रहता है या फिर उसमें भ्रम उत्पन्न होता है क्योंकि श्रोता अपनी भाषिक – ग्रहण- योग्यता के अनुसार अर्थ को ग्रहण करता है।

वक्ता और श्रोता में, संदेश- सम्प्रेषण की प्रक्रिया में विचारों का तार्किक क्रम, सही प्रतिक्रिया, मनोभावों को यथोचित ढंग से व्यक्त करने के लिए सही शब्दावली और उचित भाव – भंगिमा, वक्तव्य की स्पष्टता आदि न हो तो सम्प्रेषण प्रभावपूर्ण नहीं रहता और अनेक भ्रामक स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

जैसे- सर्दी के मौसम में खुली हुई खिड़की देखकर वक्ता यदि कहता है- ‘आज बहुत ठंड है।’ और उसकी प्रतिक्रिया में श्रोता ‘हाँ’ कहकर खामोश रह जाता है तो इस स्थिति में सम्प्रेषण अस्पष्ट और भ्रामक रहा। क्योंकि वक्ता का उद्देश्य कि ‘आज बहुत ठंड है, इसलिए कृपया, खिड़की बंद कर दें श्रोता तक सम्प्रेषित नहीं हो पाया और शब्दों से व्यक्त व्यंजनार्थ को न समझ पाने के कारण श्रोता केवल ‘हाँ’ कह कर रह जाता है, खिड़की बन्द नहीं करता।’ इसी प्रकार भ्रामक सम्प्रेषण का एक अन्य उदाहरण देखा जा सकता है।

वक्ता का ये कथन कि ‘मोहिनी नाचने वाली है’, श्रोता को भ्रम में डाल सकता है क्योंकि इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं। एक ‘मोहिनी नाचने का काम करती है’ और दूसरा, ‘मोहिनी अभी नाच करने वाली है। ‘श्रोता इनमें से किस अर्थ को ग्रहण करे यह उसके लिए एक समस्या हो सकती है।

पहले उदाहरण में यदि उदाहरण लक्षणा और व्यंजना जैसी शब्द की शक्तियाँ भ्रम का कारण हैं तो दूसरे भाषा की द्वयार्थकता । कहने का तात्पर्य है कि यदि एक ओर वक्ता – श्रोता की भाषाई – दक्षता सम्प्रेषण को प्रभावित करती है तो दूसरी ओर भाषा की अपनी संरचना एवं विशेषता सम्प्रेषण में भ्रामकता उत्पन्न करती है।

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