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भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है

आज हम उस फिल्म के बारे में बताने जा रहे है जो केवल इतिहास का हिस्सा बन कर रह गई। हम सिर्फ इस सवाल का जवाब नहीं देने जा रहे की भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है बल्कि उसकी अनसुलझी कहानियों के बारे में भी बताने जा रहे है। क्या आपको पता है की यह ऐतिहासिक ऐसी फिल्म थी जिसके बारे में आप सिर्फ पढ़ सकते है, लेकिन उसे देख नहीं सकते। आप उसे क्यों नहीं देख सकते? जानने के लिए पूरा आर्टिकल पढ़े।

भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है

भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है

भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा है। गूंगे फिल्मों से बोलने वाली फिल्मों की दस्तक 14 मार्च 1931 को हुई। आर्देशिर ईरानी निर्देशित ‘आलम आरा’ उसी दिन मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में रिलीज हुई थी। हालांकि इससे पहले भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के ने भी फिल्मों में आवाज देने के कई प्रयास किए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। फिल्मों के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले जाने-माने आलोचक फिरोज रंगूनवाना 50 के दशक में आलम आरा के निर्देशक आर्देशिर ईरानी से मिले।

आलम आरा फिल्म की कहानी क्या है

अलमरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कहानी है। यह जोसेफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। जोसेफ डेविड ने बाद में ईरानी की फिल्म कंपनी के लिए एक लेखक के रूप में काम किया। फिल्म में एक राजा और उसकी दो झगड़ालू पत्नियां दिलबहार और नवबहार हैं। दोनों के बीच झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि नवबहार राजा के उत्तराधिकारी को जन्म देगा।

भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है

क्रोधित दिलबहार बदला लेने के लिए राज्य के प्रमुख मंत्री आदिल से प्यार की गुहार लगती है, लेकिन आदिल ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है। क्रोधित होकर, दिलबहार ने आदिल को जेल में डाल दिया और उसकी बेटी अलमारा ने उसे निकाल दिया। अलमारा को बंजारों द्वारा पाला जाता है।

जब वह युवा होती है तो अलमारा महल में लौट आती है और उसे राजकुमार से प्यार हो जाता है। अंत में दिलबहार को उसके कार्यों के लिए दंडित किया जाता है, राजकुमार और अलमारा की शादी हो जाती है और आदिल को रिहा कर दिया जाता है।

पहली बोलती फ़िल्म के निर्माता कौन थे

पहली बोलती फ़िल्म के निर्माता आर्देशिर ईरानी थे। ईरानी और उनकी टीम इम्पीरियल स्टूडियो ने विदेशों से टैनोर सिंगल सिस्टम कैमरे आयात किया था। जिस समय आर्देशिर ईरानी आलम आरा बना रहे थे, उस समय कृष्णा मूवीटोन, मदन थिएटर्स जैसी कंपनियां भी बोलती फिल्में बनाने की कोशिश कर रही थीं। ईरानी ‘आलम आरा’ की शूटिंग जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं ताकि उनकी फिल्म भारत की पहली बोलती फिल्म बने। इस तरह पहली बोलती फ़िल्म के निर्माता आर्देशिर ईरानी बने थे।

पहली बोलती फिल्म की समस्या

फिरोज रंगूनवाला ने बताया कि फिल्म की शूटिंग में काफी दिक्कतें आईं। आसपास कई आवाजें थीं जो एक साथ रिकॉर्ड की गईं। ऐसे में दिन में शूट करना काफी मुश्किल था। फिल्म में ज्यादातर कलाकार मूक फिल्मों के जमाने के थे। ऐसे में उन्हें बोलती फिल्म में काम करने की तकनीक के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उन्हें घंटों तक माइक पर बोलना सिखाया जाता था। उन्हें बताया गया कि अपनी जीभ को कैसे साफ करें। टैनोर सिंगल सिस्टम कैमरे से शूटिंग करना एक बड़ी समस्या होती। ध्वनि और चित्र एक ही ट्रैक पर रिकॉर्ड किए जाएंगे। इसलिए कलाकारों को एक ही टेक में शॉट देना पड़ा।

भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है

भारत की पहली बोलती फिल्म जिसे नहीं देखा जा सकता

उस समय फिल्म के नेगेटिव ज्यादा समय तक नहीं टिकते थे। फिल्म “आलम आरा” के बहुत सीमित प्रिंट बनाए गए थे। उस समय फिल्म आर्काइव जैसी कोई संस्था नहीं थी। जब स्टूडियो कल्चर समाप्त होने लगी, तो फिल्मों के प्रिंट कबाड़खानों को एक पैसे में बेचे गए क्योंकि उन स्टूडियो भवनों में कुछ और बनाया जाने लगा था। इस प्रकार भारतीय सिनेमा की इस ऐतिहासिक फिल्म का कोई प्रिंट नहीं है और अब इसे केवल तस्वीरों के माध्यम से याद किया जाता है।

अब आप जान गए की भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी है और वह क्यों आप अब नहीं देख सकते। यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की मदद माँगनी पड़ी। फिल्म और उसका संगीत दोनों ही व्यापक रूप से सफल रहे, फिल्म के गीत “दे दे खुदा के नाम पर” के साथ, जो भारतीय सिनेमा का पहला गीत भी था और इसे अभिनेता वज़ीर मोहम्मद खान ने गाया था, जिन्होंने फिल्म में एक फकीर की भूमिका निभाई थी। वह कैरिक्टर बहुत प्रसिद्ध हुआ। चूंकि उस समय भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत नहीं की गई थी, इसलिए गीत को हारमोनियम और तबला संगीत की संगत के साथ लाइव रिकॉर्ड किया गया था।

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