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आंशिक कृषि आय क्या है

कृषि आय की परिभाषा आयकर अधिनियम की धारा 2 (1A) में दी गई है। कृषि आय में भूमि से प्राप्त किराया अथवा लगान, भूमि से कृषि क्रिया करने प्राप्त आय, किसान या किराया प्राप्तकर्ता द्वारा अपने उपज को विक्रय योग्य बनाने या उपज को बेचने वाली क्रिया करने प्राप्त आय आदि शामिल हैं। इस लेख में हम आंशिक कृषि आय क्या है या अंशत: कृषि आय (Partly Agricultural Income) क्या है जानेंगे।

आंशिक कृषि आय क्या है

आंशिक कृषि आय क्या है

कभी-कभी कोई व्यक्ति या औद्योगिक संस्थान स्वयं के द्वारा उत्पादित कृषि उपज अथवा किराये के रूप में प्राप्त कृषि उपज का प्रयोग कच्चे माल के रूप में करते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि किसी निर्माता या व्यवसायी ने कृषि भूमि पर उत्पादित कृषि उत्पाद का प्रयोग कच्चे माल के रूप में करके कुछ माल निर्मित किया है और उसे बाजार में विक्रय करके आय प्राप्त की है, तो इस आय का एक भाग कृषि आय तथा शेष भाग गैर-कृषि आय मानी जायेगी। इस सम्पूर्ण आय में से कृषि तथा गैर-कृषि आय के भाग की अलग-अलग गणना करना आवश्यक है। इस सम्पूर्ण आय में शामिल कृषि आय के भाग को आंशिक कृषि आय या अंशत: कृषि आय (Partly Agricultural Income) कहते हैं।

उदाहरण (Example) – अधिकांश चीनी बनाने वाले कारखाने स्वयं के खेतों पर गन्ना उत्पन्न करके, इस गन्ने को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करके एक प्रक्रिया के द्वारा चीनी बनाकर बाजार में बेचते हैं और आय कमाते हैं। इस सम्पूर्ण आय का एक भाग कृषि आय माना जाता है जिसे अंशत: कृषि आय या आंशिक कृषि आय क्या कहते हैं। इस आय में गैर – कृषि आय का भाग कर योग्य होता है।

कृषि आय तथा गैर – कृषि आय (व्यावसायिक आय) को पृथक् करना आवश्यक क्यों?
कुल आय में से कृषि आय के अंश को पृथक् करना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि:

(1) कृषि आय कर – मुक्त होती है।
(2) सम्पूर्ण आय में शामिल गैर-कृषि आय का भाग ‘व्यवसाय एवं पेशे के लाभ’ शीर्षक के अन्तर्गत कर-योग्य होता है। यदि कृषि आय के अंश को पृथक् नहीं किया जायेगा , तो सम्पूर्ण आय ‘ व्यवसाय एवं पेशे के लाभ ‘ शीर्षक में हो जायेगी और इस प्रकार कर की रकम की गणना भी त्रुटिपूर्ण हो जायेगी ।

अंशत: कृषि आय के भाग की रकम ज्ञात करने सम्बन्धी नियम (RULES FOR ASCERTAINING AMOUNT OF PARTLY AGRICULTURAL INCOME)

कुल आय में से कृषि आय का अंश ज्ञात करने सम्बन्धी नियम निम्नलिखित हैं:

(1) चाय के अतिरिक्त कृषि उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करने वाले निर्माणकर्ताओं की आय [ नियम 7] – यह नियम चीनी के कारखानों, तेल, वनस्पति घी, आटा तथा ऐसे अन्य निर्माणकर्ताओं पर लागू होता है जो स्वयं के द्वारा उगाये गये कृषि उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयोग में लाकर माल निर्मित करते हैं और उनका विक्रय कृषि करते हैं। ऐसे निर्माताओं की कुल आय में कुछ कृषि आय का तत्व विद्यमान रहता है तथा कुछ गैर-कृषि आय का।

इस नियम के अनुसार कृषि उपज का बाजार मूल्य या विक्रय मूल्य कृषि आय होती है और इस बाजार मूल्य को कुल विक्रय मूल्य में से घटा देने पर गैर-कृषि आय (कर-योग्य आय ) बचती है, परन्तु इस सम्बन्ध में कृषि करने का कोई भी खर्चा नहीं घटाया जायेगा। संक्षेप में,

कृषि आय = कृषि उपज का बाजार मूल्य (उपज को बाजार में न बेचने की दशा में निम्नलिखित तीन का योग ही उस उपज का बाजार मूल्य मानेंगे- (i) कृषि से सम्बन्धित व्यय, (ii) भूमि का किराया तथा (iii उचित लाभ का अंश

गैर-कृषि आय = कुल विक्रय मूल्य कृषि उपज का बाजार मूल्य

(2) कृषि उपज को लगान या किराये के रूप में प्राप्त करके उसे कच्चे माल में प्रयोग करने वाले निर्माणकर्ताओं की आय – इस दशा में भी उपरोक्त (1) में वर्णित गणना विधि प्रयोग में लाई जायेगी।

(3) चाय के उत्पादन एवं निर्माण से आय [नियम 8] – भारत में उत्पादित एवं निर्मित चाय के विक्रय में भी कृषि आय का अंश शामिल होता है। इस आय का 60% भाग कृषि आय माना जाता है तथा शेष 40 % भाग गैर – कृषि आय होती है, जिसे व्यापार अथवा पेशे के लाभ शीर्षक में कर – योग्य मानकर जोड़ते हैं।

यदि कोई साझीदार चाय के उत्पादन में संलग्न व्यावसायिक फर्म से वेतन या लाभ के रूप में कुछ प्राप्त करता है, तो ऐसी प्राप्ति के 60% भाग को उसकी कृषि आय माना जायेगा जो कर मुक्त होगी एवं शेष 40% भाग उसकी गैर-कृषि आय या व्यावसायिक (कर योग्य) होगी। यदि कोई व्यक्ति सीधे चाय की हरी पत्ती बेचता है तो उससे होने वाली आय 100 % कृषि आय मानी जायेगी।

(4) रबर के उत्पादन से आय [नियम 7A] – रबर के उत्पादन व विक्रय से प्राप्त आय का 65 % भाग कृषि आय मानी जाती है तथा 35% भाग गैर – कृषि आय मानी जाती है। मरे हुए पौधों के स्थान पर नये पौधे लगाने का व्यय लागत में जोड़ा जायेगा। यदि कोई अनुदान रबर बोर्ड से प्राप्त होता है तो उसे उत्पादन लागत में से नहीं घटाया जायेगा।

(5) कॉफी के उत्पादन एवं निर्माण से आय [नियम 7B] – इसमें निम्नलिखित दो प्रकार के प्रावधान है :

(अ) जो करदाता कॉफी का उत्पादन एवं निर्माण भारत में करके उसका विक्रय करते हैं और इससे जो आय प्राप्त होती है उसका 75% भाग कृषि आय माना जाता है तथा शेष 25% भाग गैर – कृषि आय मानी जायेगी जिसे व्यावसायिक आय कहेंगे और कर-योग्य होगी।

(ब) जो करदाता भारत में कॉफी का उत्पादन, निर्माण करके उसे भूनना या तपाना (Roasting), पीसना (Grounding) (इसमे कोई खुशबू लाने हेतु कोई तत्व मिलाये अथवा नहीं) आदि क्रियायें करके उसका विक्रय करते हैं तो इस आय का 60% भाग कृषि आय होगी तथा शेष 40% भाग गैर – कृषि आय कहलायेगी। इससे सम्बन्धित कुल आय की गणना करते समय उन पौधों का व्यय लागत में शामिल करेंगे जो मरे हुए पौधों के स्थान पर लगाये जाते है किन्तु कॉफी बोर्ड से कोई अनुदान या सहायता (Subsidy) प्राप्त होती है तो उसे लागत में से घटाया नहीं जायेगा।

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