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आमरण अनशन क्या होता है

आमरण अनशन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सबसे शक्तिशाली हथियार था और उन्होंने इस हथियार का इस्तेमाल देश की मांगों को पूरा करने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ किया था। आमरण अनशन लंबे समय से विरोध का एक शक्तिशाली हथियार रहा है, लेकिन कुछ ऐसे मामलों में, उपवास करने वालों की मौत भी हो चुकी है। इतिहास में कई ऐसे नेता हुए हैं, जिन्होंने अपनी मांगों को पूरा करने के लिए आमरण अनशन के हथियार का इस्तेमाल किया है, जिनमें सबसे प्रसिद्ध नाम महात्मा गांधी का है। इस लेख में हम आमरण अनशन क्या होता है जानेंगे।

आमरण अनशन क्या होता है

आजादी के बाद, पोट्टी श्रीरामुलु भूख हड़ताल से मरने वाले पहले राजनेता थे। उन्होंने अलग आंध्र प्रदेश की मांग के लिए 19 अक्टूबर 1952 को मद्रास में आमरण अनशन शुरू किया। 52 दिन बाद 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने हिंसक विरोध शुरू कर दिया और अंततः सरकार को एक अलग आंध्र प्रदेश की स्थापना करनी पड़ी।

आमरण अनशन क्या है

आमरण अनशन, अपनी मांगे पूरी होने तक अहिंसक तरीके से किया गया अन्न त्याग का आंदोलन है। अनशन, धरना और पद यात्रा किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों तक उनकी बात नहीं पहुंचती है, तो इन सभी तरीकों को माध्यम बनाना पड़ता है। अनशन के साथ राजनीति का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना कि योगी भगवान को पाने के लिए अन्न-जल का त्याग करते हैं। यदि किसी के मन में गन्दगी नहीं है और उसका उद्देश्य सार्थक है, तो आमरण अनशन से बढ़कर कोई शस्त्र नहीं है।

महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक, हमने लंबे समय तक उपवास और धरना देखा है। साल 1929 में लाहौर जेल के अंदर ऐसी भूख हड़ताल शुरू की गई थी, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। उस समय क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ दास ने भारत के राजनीतिक कैदियों के साथ यूरोपीय कैदियों की तरह व्यवहार करने की मांग करते हुए आमरण अनशन शुरू किया था।

दास की हड़ताल को तोड़ने के लिए ब्रिटिश जेल प्रशासन ने काफी प्रयास किए। मुंह और नाक से जबरदस्ती खाना डालने की भी कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अंत में ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। लेकिन यतीन्द्रनाथ दास की अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी, उनका एकमात्र उद्देश्य सभी भारतीय कैदियों के साथ समान व्यवहार करना था।

लेकिन वर्तमान समय में चाहे अनशन हो या धरना प्रदर्शन, वोट के लालच को छोड़कर वे अपने राजनीतिक हितों पर निर्भर हैं, जिसमें समाज और देश का हित कम ही देखने को मिलता है। पुराने जमाने में, गांधीजी अहिंसा और सत्याग्रह के तहत कई बार भूख हड़ताल पर जाते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में 15 आमरण अनशन किए, जिनमें से तीन 21 दिनों तक चले। इन तीन उपवासों में गांधीजी को कोई व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ नहीं हुआ, केवल समाज के लाभ के लिए प्रयास किए गए।

हालांकि आज राजनीतिक फायदे के लिए आमरण अनशन या भूख हड़ताल और धरना प्रदर्शन किया जाता रहा है। ज्यादातर नेताओं को समाज और देश से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि यह कहें कि इन लोगों ने सबसे मजबूत हथियार की गरिमा को गिरा दिया है। शायद इसी वजह से जब भी आम लोगों की बातचीत में अनशन या धरना शब्द का जिक्र आता है तो लोगों का पहला सवाल होता है कि आने वाले समय में वह कौन सी पार्टी बनाएगी या कहां से चुनाव लड़ेगी। कोई यह नहीं सोचता कि अनशन करने वाले को क्या परेशानी है?

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