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अहीर रेजिमेंट क्या है

भारतीय सेना में अलग-अलग रेजिमेंट हैं। हालांकि यह सिस्टम सिर्फ आर्मी में है। वायुसेना या नौसेना में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। आपने सिख रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, मराठा रेजीमेंट आदि कई नाम सुने होंगे। ये एक तरह से आर्मी यूनिट हैं। इन सभी इकाइयों को मिलाकर सेना पूर्ण होती है। सेना में रेजीमेंटों का विभाजन ब्रिटिश काल में ही हुआ था। फिर अंग्रेजों ने आवश्यकतानुसार विभिन्न समूहों में सेना की भर्ती की। इस लेख में हम अहीर रेजिमेंट क्या है और Ahir Regiment के इतिहास को जानेंगे।

अहीर रेजिमेंट क्या है

अहीर रेजिमेंट क्या है

शुरुआत में अहीरों को 19 हैदराबाद रेजीमेंट में भर्ती किया गया था, जिसे बाद में कुमाऊं रेजीमेंट कहा गया। पहले इस रेजिमेंट में उत्तर प्रदेश के राजपूत और दक्कन के पठार से मुसलमानों की भर्ती की जाती थी। 1902 में रेजिमेंट हैदराबाद के निजाम से जुड़ी थी। 1922 में भारतीय सेना के पुनर्गठन के बाद, 19 हैदराबाद रेजिमेंट की संरचना बदल गई और डेक्कन मुसलमानों को इससे हटा दिया गया।

1930 में, फिर से संरचनात्मक परिवर्तन हुए और कुमाऊँनी, जाट, अहीर और मिक्स क्लास के लिए एक-एक कंपनी बनाई गई। 27 अक्टूबर 1945 को रेजिमेंट का नाम बदलने की अनुमति दी गई और इसका नाम बदलकर 19 कुमाऊं कर दिया गया। आजादी के बाद इसका नाम कुमाऊं रेजीमेंट रखा गया।

अहीर जवान भारतीय सेना की कई रेजीमेंट में भर्ती होते हैं। कुमाऊं, जाट, राजपूत, अहीर जवानों जैसी रेजीमेंटों में निश्चित संख्या में भर्ती की जाती है और पैराशूट रेजिमेंट और अन्य इंजीनियर, सिग्नल, आर्टिलरी कोर जैसी मिश्रित श्रेणी की रेजिमेंट सभी जातियों के लोगों की भर्ती करती है। अहीर रेजीमेंट में ‘अहीर’ शब्द हरियाणा के दक्षिणी जिलों रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और गुरुग्राम के पूरे क्षेत्र को अहिरवाल क्षेत्र से आया है। यह राजा राव तुलाराम से संबंधित है जो 1857 की क्रांति के नायक थे। वह रेवाड़ी में रामपुरा रियासत के राजा थे।

अहिरवाल की धरती पर अंग्रेजों से लड़ने वाले राजा राव को क्रांति का महानायक कहा जाता है। इस इलाके में अहीर रेजीमेंट की मांग लंबे समय से होती आ रही है। जिन राज्यों में अहीर की आबादी अधिक है, वहां यह मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

अहीर रेजिमेंट का इतिहास

1962 में रेजांग ला के युद्ध में हरियाणा के वीर अहीर सैनिकों की वीरता का समाचार पाकर अहीर के सैनिक पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए। उन 117 अहीरों की वीरता और बलिदान को आज भी याद किया जाता है। उस समय कुमाऊं रेजीमेंट की 13वीं बटालियन की सी कंपनी के ज्यादातर जवान चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो गए लेकिन दुश्मन को आगे नहीं बढ़ने दिया। तमाम कोशिशों के बावजूद वे रेजांगला चौकी पर कब्जा नहीं कर पाए और चुशुल में आगे बढ़ने का उनका सपना चकनाचूर हो गया।

कुमाऊं रेजीमेंट की 13वीं बटालियन को रेजांग ला में सबसे प्रमुखता तब मिली जब अहीर रणबांकुरे ने चीनियों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। आजादी के बाद बनने वाली यह पहली बटालियन थी। अक्टूबर 1948 में कुमाऊँनी और अहीर समुदायों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया। 1960 में 2 कुमाऊं और 6 कुमाऊं से अहीरों के स्थानांतरण के बाद, 13 कुमाऊं रेजिमेंट पहली अहीर बटालियन बन गई।

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