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अघोरी बाबा कौन होते हैं | जानें, इस रहस्यमय संप्रदाय का सच

अघोरी पंथ के कुछ सिद्धांत ‘नाथ पंथ’ से जुड़े हैं। साथ ही उनके कुछ सिद्धांत नाथ पंथ और तंत्रमार्ग से जुड़े हैं। संप्रदाय की उत्पत्ति गुजरात के अबू से हुई होगी ऐसा माना जाता है। इस लेख में हम अघोरी बाबा कौन होते हैं और अघोरी संप्रदाय का इतिहास और पहचान क्या है जानेंगे।

अघोरी बाबा संप्रदाय

अघोरी बाबा कौन होते हैं

अघोरी बाबा संप्रदाय या अघोरी पंथ, शैव संप्रदाय का हिस्सा है, जो भगवान शिव की आराधना करता है। इसे ‘अघोर’, ‘औघड़’, ‘औदर’, ‘सरभंग’ और ‘अवधूत’ के नाम से भी जाना जाता है। अथर्ववेद और यजुर्वेद में शिव की अघोर तनु का उल्लेख मिलता है। भगवान शिव को मैसूर और अन्य भागों में ‘अघोरीश्वर’ के रूप में भी पूजा जाता है। इससे प्रस्तावित पंथ शैव संप्रदाय के ‘पशुपत’ और ‘कालमुख’ संप्रदायों से संबंधित है।

अघोरी बाबा संप्रदाय का इतिहास

चीनी यात्री ‘युआन च्वांग’ ने इन संप्रदायों का वर्णन किया है। ये लोग अपने शरीर पर राख, गले में मानव खोपड़ी की माला के साथ नग्न रहते थे। कुछ लोगों ने पेड़ की छाल या पत्ते पहने थे, जबकि अन्य ने बाघ की खाल पहनी थी।

‘चामुंडा’ अघोरी लोगों के देवता हैं और वे उन्हें बलि चढ़ाते हैं। साथ में वे लाश का मांस भी खाते हैं। आनंदगिरि ने भी ‘शंकरदिग्विजय’ में उसी तरह उनका वर्णन किया है। वे घोड़े के मांस को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के मांस खाते हैं। वे भोजन के साथ अपने स्वयं के मलमूत्र को भी खाते हैं। यह माना जाता था कि इसने उन्हें असाधारण शक्तियाँ प्रदान कीं। वे इस प्रकार को ‘अतिलिया’ कहते हैं।

पंथ के लोकाचार और दर्शन के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके सिद्धांत निर्गुण अद्वैत के अनुरूप हैं। उनकी साधना में हठ योग और ध्यान योग को प्राथमिकता दी जाती है। उनका लोकाचार तंत्रमार्गी साहित्य पर आधारित है। वे गुरु को विभूति के रूप में पूजते हैं। पंथ में शराब के सेवन की अनुमति है।

अघोरी संप्रदाय की पहचान

अघोरी बाबा संप्रदाय के किनराम और गोरखनाथ को उनके मूल गुरु कहा जाता है। अघोरी संप्रदाय की पहचान मुख्य रूप से जादू टोना और मंत्र-तंत्र करने के लिए होती है। सभी संप्रदाय एक जैसे कपड़े नहीं पहनते हैं। कोई सफेद तो कोई रंगीन कपड़ों का इस्तेमाल करता है। उनके अनुयायी हैं जो तपस्वी और गृहस्थ दोनों दृष्टिकोणों में रहते हैं। भीख मांगकर गुजारा करते हैं। जटा, रुद्राक्ष की माला, कमर पर घाघरा और हाथ में त्रिशूल लेकर उनका ध्यान आम आदमी के लिए विस्मयकारी है। यद्यपि वे संख्या में कम हैं, वे पूरे भारत में फैले हुए हैं। कुछ मुसलमान भी इन संप्रदायों के अनुयायी हैं।

अघोरी पंथ का स्थान

अघोरी पंथ विशेष रूप से बिहार और राजस्थान में असंख्य है। हाल ही में उन्होंने कपड़ों का इस्तेमाल करना शुरू किया है। उनकी औरतें गिरोहों में घूमती हैं। ब्रिटीशकाल में मानव बलि और नग्नता की प्रथा बंद हो गई। मानव हड्डियों से बनी माला की जगह अब क्रिस्टल और रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर रहे हैं।

किनराम, जिनका अठारहवीं शताब्दी के अंत में निधन हो गया, उनके प्रसिद्ध आचार्य थे। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘विवेकसार’ को पंथ में मानक माना जाता है। इस संप्रदाय को उनके नाम पर ‘किनरामी संप्रदाय’ भी कहा जाता है।

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